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सद्गुरु सन्निधि का सातत्य

07 जनवरी

पुणे के वासुदेव निवास में मैंने गुरुदेव का प्रथम दर्शन पाया और उसी समय दीक्षा का निवेदन भी कर दिया। सद्गुरुदेव ने कहा-अवश्य, अवश्य, अवश्य। अगले दिन दर्शन को गई, साधकों की भीड़ थी, बस दर्शन ही हुए। जनवरी 7 को प्रात: दीक्षा-पत्र हाथ में मिला। इसी दिन संध्या को 5.55 बजे मैं और भाऊ साहब अलग-अलग आसनों पर बैठे।

पत्र खोला और पढ़ा तो मैं अत्यंत खुश थी, क्योंकि जिस मंत्र की मैंने मानसिक प्रार्थना की वही मुझे सुलभ हो गया था। मन ही मन गुरुदेव को प्रणाम कर आसन पर आंखे बंद करके बैठ गई। ध्यान को कुछ ही समय बीता होगा कि एक विशाल गुफ़ा सामने से समीप आती सी लगी, सहसा उस गुफ़ा ने मुझे पूरा निगल लिया। मेरा पूरा शरीर भारी हो चला था, यह एक अद्भुत अनुभव था। डर के मारे मैंने आंखे खोल दीं। कुछ देर बाद साहस जुटाकर मैंने फ़िर ध्यान किया। उस दिन करीब 30 मिनट तक ध्यान लगा। अगले दिन पुन: प्रात: 6 बजे ध्यान में बैठी। मेरा शरीर धीरे-धीरे डोलने लगा। फ़िर घूर्णा व क्रियाएं होने लगी। करीब एक घण्टे तक ऐसा ही चलता रहा और अंत में मैं पीछे की ओर गिर गई। बाद में गुरुदेव से ज्ञात हुआ कि ध्यान में पीछे की ओर गिरना शुभ संकेत होता है, यह सद्गुरु व शिवकृपा का प्रसाद होता है।

बाद में मेरा नियमित ध्यान का क्रम प्रारंभ हो गया। कभी मैं चकरी की भांति घूमने लगती तो कभी धरती पर लोटपोट होती, कई बार तो चूड़ियां तक टूट जातीं। मुझे अलग-अलग ध्वनियां सुनाई देतीं, मन वश में नहीं होता। कभी अतिशय रोना तो कभी अतिशय हँसना। पीछे की ओर गिर जाती तो घंटों उसी मुद्रा में व्यतीत हो जाते। परिजन यह सब देख-देखकर आश्चर्य में पड़ जाते पर उन्हें पहले से ही निर्देश था कि आसन् पर बैठे हुए कोई भी मुझे छूए नहीं। मुझे क्रियाएं करते देखकर घर वाले बस देखते रहते थे (आजकल तो थोड़ी सी भी ऐसी क्रियाएं होने लगे तो घर के सदस्य हल्दी, कुंकुम लगाकर नमस्कार करने, पूछ-परख करने लग जाते हैं, जो एकदम गलत है) । लगभग छह मास तक यही क्रम चलता रहा। धीरे-धीरे क्रियाएं बंद होने लगी और शांत ध्यान लगने लगा।

कुछ समय बाद मेरे शरीर से नारु (एक प्रकार का कृमि) निकलने लगे। एक एक करके कुल 24 नारु निकले। असह्य शारीरिक पीड़ा होती थी (ध्यान में नहीं वरन् वास्तव में) । करीब छह महीने तक बिस्तर में पड़े रहना पड़ा, पर गुरुदेव द्वारा प्रदत्त नाम स्मरण सतत चलता रहा। ऐसे में कभी गुरुदेव के, कभी दत्त गुरु के तो कभी शिवजी के दर्शन होने लगे। कभी भी अन्य अवतारों के दर्शन नहीं हुए। मेरा मानना है कि शिव ही एकमेव ईश्वर है, वही अजन्मा, अविनाशी और अमर है। बाकी सब अवतार तो भगवान हैं पर शिव तो परमात्मा है। मैं सद्गुरु को शिव में प्रतिष्ठित करके शिवात्म सद्गुरु की ही पूजा करती। मैंने उन्हीं दिनों ध्यान में ही सभी ज्योतिर्लिंगों के दर्शन भी पाए। बाद में जब उनके प्रत्यक्ष दर्शन का अवसर पाया तो लगा कि ठीक यही दर्शन तो ध्यान में भी हुए थे।

इन छह मास तक मैं शैया पर ही रही। जब धरती पर पांव धरा तो लगा कि गुरुकृपा से मेरे पूर्व जन्मों के संचित पापकर्म नारुओं  के रूप में निकल गए और मैं पापों से मुक्त हो गई हूँ। अब मेरा साधना-पथ निष्कंटक हो चला था।

अब तो ध्यान में अंतर्प्रेरणा होने लगी। ऐसा अनुभव होगा मानो भीतर से कोई निर्देशित करता था कि ऐसे करो, वैसे करो। मन में तो बहुत-कुछ होता पर वह प्रत्यक्ष में नहीं होता, प्रत्यक्ष तो वही होता जो अंतर्प्रेरणा होती। अब ध्यान दोनों समय नियमित चलने लगा।

दीक्षा के पश्चात एक अद्भुत घटना घटी। 15 जनवरी को मैं ध्यान करने के बाद पूजा कर रही थी। गुरुदेव के चित्र पर तुलसी का हार चढ़ाया, नमन किया। अचानक हार टूटकर चित्र के समक्ष प्रज्वलित दीपक पर आ गिरा। जलता दीपक बुझ गया। उसी समय आकाशवाणी पर समाचार प्रसारित हो रहा था कि गुरुदेव समाधिस्थ हो गए हैं। समाचार जानकर भारी दु:ख हुआ। मैं दिनभर रोती रही। बैचैनी बढ़ने लगी, अंत में मैं आसन लगाकर ध्यान में बैठ गई। गुरुदेव का स्मरण करने लगी। ध्यान में मैंने गुरुदेव के अंतिम संस्कार को चलचित्रों की भांति देखा। फ़ूलों से लदा ट्रक, उसमें रखी गुरुदेव की लघु प्रतिमा के दृश्य तो मुझे आज भी याद हैं। उनके अग्नि-संस्कार की सभी विधियां और विधान मुझे ध्यान में स्पष्ट दीखे। ध्यान पूर्ण होने पर मैंने सब बाते अपने परिजनोंको  बताईं। कोई मानने को ही तैयार नहीं था। उनका कहना था कि गुरुदेव को परम्परागत रूप से समाधि दी गई होगी न कि अग्नि-संस्कार किया होगा। अगले दिन अखबारों में सारा विवरण छपा तब उन्हें आश्चर्य हुआ। मुझे जो ध्यान में दिखाई दिया, वही सब वास्तव में भी हुआ था। तभी मुझे अंतर्प्रेरणा हुई कि गुरुदेव यहीं सूक्ष्म रूप में हैं, वे कहीं गए ही नहीं। वे मेरे पास ही हैं। उन्होंने मुझे एक पल भी नहीं छोड़ा है। उनका पावन सान्निध्य सतत मुझे प्राप्त है। मुझे प्रतिपल अनुभव होता है कि वे मेरे पास ही हैं। —आपकी ’बा’

पूर्वप्रसिद्धी -जाने २००८ शिवप्रवाह.

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One response to “सद्गुरु सन्निधि का सातत्य

  1. shweta a purohit

    जून 5, 2011 at 11:58 अपराह्न

    JSK…Param Pujya Prabhu BAA….PLEASE always be with us and keep your blessing hand on us…thanx for everything

     

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