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गुरुस्साक्षात् परब्रह्म |-रेणु कौशिक

10 जनवरी

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गुरु के दर्शन करने पर मन की जो भावविभोर अवस्था होती है उसका अनुभव रेणूजीने
इस कविता में व्यक्त किया है|
श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम् |
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यामात्मनिवेदनम ||
परमपूज्य प्रभु बा के दर्शन करते हुए उन्हें नवविधा भक्ती  का  पूरा अनुभव हुआ|
उनके शब्दों में पढिये—–

कितने दिनों के बाद ये ख़ुशी आई है
इतनी ख़ुशी जो दिल में नहीं समाई है
दिल में जो ख्वाइश थी कितने दिनों से
आज वो बात पूरी होने आई है |

खुश नसीब है हम जो आपको पाया है
हर किसी के नसीब में ये नहीं आया है
एक नज़र आपकी पा जाये तो हम
इस भवसागर से पार हो जायेंगे हम |

आप जैसे इस दुनिया में कोई नहीं है
इतनी करुणा दृष्टि किसी में नहीं है
एक नजर काफ़ी है आपकी हमारे लिये
आपके हाथ का साया काफ़ी है हमारे लिये|

कितने कष्ट सहती है ‘प्रभु बा’ दूसरों के लिये
सबके दु:ख हर लेती है ‘प्रभु बा’ दूसरों के लिये
अपने भक्तों के दिलों रहती है ‘प्रभु बा
‘प्रभु बा’ ने जन्म लिया है दूसरों के लिये|

हमको अपनी शरण में रखे रहो माँ
अपनी करुणा नजरों से ढके रहो मॉं
जीवन अपना सौंप दिया है आपके हाथों में
इस जीवन की नैया अब पार करो माँ |

ऐसा लग रहा है कि जैसे सपना देख रही हूं
दिन के उजाले में जैसे तारे गिन रही हूं
देखती हूं नजरों से हर एक चीज मगर
लगता है जैसे कि कोई तस्वीर देख रही हूं|

ऐ पल तू बस थम जा यहीं पर
जिंदगी का जैसे अन्त हो रहा यहीं पर
जन्नत बस रही है आज यहीं पर
अगर आखरी सांस भी निकले तो निकले यहीं पर|

–रेणु कौशिक

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Posted by on जनवरी 10, 2011 in नवीन

 

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