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गुरुवाणी-१ (हिंदी)—प्रवचन

14 जनवरी

जहां भी जाती हूँ लोग पूछते हैं –आप प्रवचन नहीं करते क्या? ‘आशीर्वचन’ के दोन शब्द भी नहीं कहेंगे क्या? मैं सोचती हूँ कि न जाने क्यों लोगों को प्रवचन से इतना लगाव है| जहाँ कहीं भी कोई आयोजन हो, अध्यात्म का अवसर हो चहु ओर बोलना, बस बोलना ही छाया रहता है|

सद्गुरु से प्राप्त संकेतों के अनुसार मैं कह सकती हूँ कि ज्ञान की पूर्ति बाह्य संसाधनों से भी हो सकती है और उसे भीतर भी प्रकटाया जा सकता है| बाह्य विधियों में प्रवचन, श्रवण आदि का समावेश होता है जबकि अंतस् के उपायों में ध्यान धारणा आदि का उल्लेख मिलता है| बाहर के साधनों से प्राप्त ज्ञान एक प्रकार से उधार का ज्ञान है जबकि भीतर से उद्घाटित ज्ञान अपनी निजी सम्पदा है | यहाँ यह कहना बेमानी होगा कि कौनसी थाती स्थायी एवं स्वयंप्रज्ञ है |

ईश्वर को अनुभव करने, उसकी सन्निधि पाने के अनेक उपाय हैं पर सभी मार्गों में चरम् और परम् मार्ग है ध्यान| ध्यान करनेवाला मुनि होता है-क्योंकि मौन को उपलब्ध हो जाता है | ध्यान करनेवाला योगी होता है क्योंकि वह वह ईश्वर से योग करने का पात्र बन जाता है | ध्यान करनेवाला साधक होता है-क्योंकि वह जिसे साधने से आनंद की प्राप्ति होती है उसे साध लेता है| प्रवचन कहने का विषय है, जबकि ध्यान करने का विषय है, प्रवचन में बाह्य साक्ष्य है जबकि ध्यान में अंतर्साक्ष्य हैं, प्रवचन में द्वैत का स्वीकार है जबकि ध्यान में एकात्मता का अंगीकार है|

मुझे प्रवचनकारों से परहेज नहीं है, न कोई शिकायत है तथा न ही अपने विचार किसी पर थोपने की मंशा है| न प्रवचन परम्परा को नकारना या  उसका महत्त्व कम करके आंकना है | किसी एक स्थिति को बनाने में , किसी एक भावदशा का आविर्भाव करने तक प्रवचन का महत्त्व नि:संदेह है |पर आगे की यात्रा तो ध्यान से ही सधेगी | कथा मे केवल वे ही डूबकर कुछ थाह पा सकते हैं जिनका मन ईश्वरीय भक्ति में रंगने के लिए प्रस्तुत होता है |कथाओं का मर्म वे ही जानते है जो हरिरस पान के लिए तत्पर हों, बाकी तो प्रसंगोंकी तार्किकता में ही उलझ कर रह जाते हैं। अनेक बार कथाकारों से लेकर श्रोता    तक तर्क-वितर्क या वाग्विलास में सन्नद होकर मूल मंतव्य को ही विस्मृत कर बैठते है। कहा तो जाता है कि ‍ज्ञान गंगा में गोते लगा रहे हैं पर सेंकडों कथाओं और ज्ञानयज्ञों के बाद भी कोरापन प्रत्य‍क्ष दिखाइ देता है । क्योंकि मन की एकाग्रता वहां सधी नहीं।

मेरे पूज्य गुरुदेव कहते थे कि ईश्वर को पाने के असंख्य मार्ग है। उन्होंने हमें जो मार्ग दिखाया, हमें जो दीक्षा दी- वह है शक्तिपात साधना । इसके मूल में भी ध्यान ही है। ध्यान और नाम जप साथ साथ । प्रवचन का उल्लेख तक नहीं है ।उन्होंने स्वयं भी जीवनभर कोई प्रवचन नहीं किया । उन्होंने हजारों साधकों को ध्यान- पथ का पथिक बनाया और गंतव्य तक जाने की सामर्थ्य भर दी।जो ज्ञान  घंटों के प्रवचनों से नहीं मिलता वह ज्ञान  परमहंसों के पास मौन होकर बैठने या उनके इंगित मार्ग से ध्यान करने से सहज ही प्राप्त हो जाता है। हज़ारों शब्द जिस साक्षात्कार को नहीं करा पाते उसे नि:शब्द ध्यान, सद्गुरु की एक कृपादृष्टि हमारी झोली मे डाल देती हैं।   मौन मी भाषा को समझना ईश्वर की ओर बढ़नेवाला निर्णायक कदम होता है।

दत्त परंपरा में जितने सिद्ध-सन्त हुए हैं जैसे ज्ञानेश्वर , गजानन महाराज, माणिक प्रभु, स्वामी समर्थ, सांई बाबा, रामकृष्ण परमहंस आदि इन्होंने प्रवचन नहीं करके प्रमाण दिये हैं । अपने संगियों को अनुभूतियां कराते हुए ईश्वरीय शक्ति से साक्षात्कार कराया है । मैं फ़िरसे स्पष्ट कर दूं कि इसका आशय यह नहीं है कि प्रवचन का कोई सार नहीं होता। न यह तात्त्पर्य है कि प्रवचनकर्ता संत और ध्यानी संत में कोई गुणात्मक भेद  होता है। महापुरुषों में कभी भी बोलने या न बोलने को लेकर मतभेद नहीं रहे हैं। क्योंकि वे बोले तो उनका अनुभव उनके शब्दों के पीछे प्रमाण बनकर खड़ा था।  जब भी प्रवचन परम्परा के संतो पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं की उन्होंने पहले पाया और फिर उसे आनंद में भरकर गाया| उनका सन्गान न तो किसी को सुनाने के लिए था और ना ही किसी को प्रभावित करने हेतु था, वे तो बस अपनी मस्ती में बोल रहे थे| कौन लाभान्वित हुआ और कौन चूक गया यह भी उन्हें ज्ञात न था| आज भी इसप्रकार के प्रवचन असरकारी व प्रेरक हैं ही| किंतु जब जब किसी ने भी परमात्त्व तत्त्व से साक्षात्कार किया तो सामान्यत: वह मौन और ध्यानस्थ हो गया| यही स्वाभाविक प्रक्रिया है|

याद रखें ईश्वर चर्चा, विवाद , व्यंग्य, ईर्ष्या, द्वेष और ज्ञानाभिमान सें नहीं निरंतर साधना, ध्यान, प्रेम और चिंतन से प्राप्त होता है| साधक के लिए गुरु मंतव्य से परे कोई सत्य नहीं, दुनिया की फ़िक्र छोड़कर गुरु की नज़रों में उठने का उपक्रम ही ध्यान की शुरुआत है और ध्यान से तत्त्व प्राप्ति अवश्यंभावी है|

शिवसुगंध २००७ में यह आशीर्वाद प्रसिद्ध हुए थे | परमपूज्य बा के इन शब्दों क़ा मराठी अनुवाद  आप यहॉं देख सकते है |

‘साधनचतुष्टय’ का काफी सरलता से विवरण और ‘ध्यान का महत्त्व’ इस व्याख्यान में आ जाता है | ‘साधनचतुष्टय’ के बारे में ज्यादा जानकारी यहॉं देखिये|

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2 responses to “गुरुवाणी-१ (हिंदी)—प्रवचन

  1. rani gadre

    जनवरी 16, 2011 at 7:42 पूर्वाह्न

    shabbash!!

     
  2. Raj

    जनवरी 15, 2011 at 5:02 पूर्वाह्न

    Bahut hi sundar..bar bar ye bate hamare samane aati rahe .. aur Ishwar aur hamre bich ka fasala kam ho gaye.. Dhanyawad

     

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