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मधुराष्टकम्-हिंदी

22 जनवरी

कुछ दिन पहले ‘शिवप्रवाह’ का एक पन्ना पढ रही थी |परमपूज्य प्रभु बा को दीक्षा पाप्त होने के दो साल बाद आया हुआ एक अनुभव पढा|  वे दोपहरके समय भोजन करती और हरप्रकारसे प्रयत्न करती की आँखे बंद न हो | ध्यान न लग जाय | किन्तु लाख प्रयत्न कर भी अपने आप आँखे मूंद लेती और ध्यानावस्था में चली जाती| जब ध्यान  खत्म होता तो दिखता की खाना इधर उधर बिखर गया है|  मानो कोई खाकर  गया हो|  दो छोटे हाथ  आकर खाने से   रोक रहे हैं ऐसा एहसास होता| कुछ समय बाद ध्यान करते हुवे स्वयं भगवान् कृष्ण प्रशाद भक्षण करने आते है ऐसा सद्गुरुद्वारा कहा गया|  यह सारा अनुभव ऐसी चित्रदर्शी शैली में ” बा”   कहती है, इसे यहाँ जरूर पढिये|

पढते हुए मन में खयाल आया इसे कहते है मधुरा भक्ती !

मीराबाई, सूरदास और कितने सारे आधुनिक संतोंको भी कृष्णचरित्र पर काव्य करने का मोह हुआ| उस कृष्ण का सारा वर्तन ….उसके आस पासका सारा विश्वही मधुर….मीठा, सब कुछ मुरलीके स्वरोंसे निनादित, भक्तीरस में परिप्लुत है|

इन विचारोंके आवर्तन में सबसे पहले याद आयी ‘मधुराष्टकम्’ इस स्तोत्र की |  श्रीमद् वल्लभाचार्यजी की इस प्रासादिक रचनामें पुष्टिमार्गीय भक्ती के सूर है|

उस कृष्णकी वाणीमें मिठास, उसका चालचलन सुडौल,हंसी मनमोहक, वस्त्रप्रावरण आकर्षक, गले के हार सुगंधी , उसकी बंसुरी के मुग्ध करनेवाले, सुस्वर, रूप मनोहारी, अंगप्रत्यंग लावण्यमयी, उसका नृत्य सुंदर, लीलाकमल अनुपम, गोपीयाँ, यमुनतट का परिसर सारा अतिशय मीठा….जैसे उस गोवर्धन गिरिधारी का अस्तित्व सारें कणों कणों में भरा हुआ हि ! इसीलिये यह सब  मधुर है, सब इसका अनुभव करना चाहते है|

बडा़ही विलक्षण है यह स्तोत्र. जग मिथ्या, झूठा नहीं.| यह परमेश्वरकी निर्मिती है|  वह तो अनूठीही होगी और सच भी !  यह  विचार कितना प्रभावशाली रूपसे यहाँ कहा गया है| वल्लभाचार्य  पुष्टिमार्गाके प्रवर्तक थे| भगवद्भक्ती यही उसके निकट जाने का मार्ग है ऐसा विचार उन्होंने अपने  अणुभाष्यद्वारा प्रवर्तित किया| बालकृष्णकी वात्सल्यभावसे भक्ती इस मार्गमें बतायी है| नामजप इस मार्ग में काफी महत्त्वपूर्ण है|

सगुण साकार स्वरूपमें परमेश्वरकी भक्ती करनेसे गोलोक प्राप्त होता है| यही मुक्ती है ऐसा उनका मानना था|

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