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सद्गुरु –सूरज का संकल्प-वरदीचन्द राव.

27 जनवरी

मैने सूरज को देखा,

पर उसकी उष्मा से अनभिज्ञ ही रहा|

मैने सूरज के रथ में बैठकर भी,

अंधकार ही तो सहा|

मैं पागलपन में,

सूरज का मूल्यांकन करता रहा|

दंभ से अपनी झोली भरता रहा,

पर मुझे नहीं पता था कि;

सूरज तो प्रकृति का अनुपम उपहार है,

परमात्मा का अखंड प्यार है|

वह न किसी पर खीझता है  न रीझता है,

न नाराज होता है न खुश होता है|

अपना हो या पराया, जाना हो या अनजाना,

सभी को अपनी रोशनी में, समान रूप से भिगोता है|

सूरज का काम है -बांटना प्रकाश,

आलोकित करना धरती और आकाश,

सूरज का स्वभाव है, जगत को जगमगाना|

प्राणिमात्र में भर देना चेतनता,

जीवंतता और सकारात्मकता का खजाना,

सूरज आंशिक चाहो तो आंशिक,

पूर्ण चाहो तो पूर्ण मिलता है|

अपने चारों ओर हम भले ही दीवारें खींच दें,

तो भी दीवार के पार–

सूरज अपने हाथों से थपथपाता है;

हमारे बचकानेपर तरस खाता है|

सूरज को पुष्प, जल नैवेद्य,या कुछ भी अर्पण करो|

श्रद्धा या यहां तक कि अश्रद्धा का तर्पण भी करो|

सूरज सम है, सूरज निर्भ्रम है, सूरज ब्रह्मांड का धुरी है|

सूरज समाधि है, श्रद्धा है, सबुरी है|

सूरज न उगता है न अस्त होता है;

सूरज न जगता है न सोता है|

सूरज बिना जीवन की कल्पना बेमानी है,

सूरज भूत, वर्तमान और भविष्य की ,

आहट सुनता परम अवधानी है|

यह जानता है सबके भीतर की हलचल,

यह नापता है भावों का धरातल,

इसकी आदत है अंधकार का दमन कर,

हरेक को प्रकाश से नहलाना,

सूरज चाहता है सबको उपर उठाना|

इस प्रक्रिया में ,किसी को आनंद, किसी को क्रोध,

किसी को उपेक्षा, किसी को बोध,

किसी को द्वेष, किसी को प्रेरणा,

उपजत होगी, पर वह इन भावों से हमें परे ले जाता है,

हर सूरज खण्ड खण्ड होकर,

अपने समय के पत्थरों में समा जाता है|

ताकि सम्पर्कित पाषाण प्राणप्रतिष्ठित हो जाये|

वह पत्थर सूरज का आभार भले ही न माने,

पर सूरज का संकल्प है,

वह इतनी उर्जा भर देता है कि

किसी को कभी भी अंधकार नहीं सता पाये|

—–रचना-श्री व. राव.


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3 responses to “सद्गुरु –सूरज का संकल्प-वरदीचन्द राव.

  1. स्वागता

    जनवरी 28, 2011 at 6:46 पूर्वाह्न

    यह रचना वरदीचन्द रावकी है|
    उनकी काफी कविताए इस साइट पर प्रदर्शन के लिए रखने की अनुमती मिली है|
    धन्यवाद रावसाहेब! धन्यवाद पण्ड्याजी! धन्यवाद राजेन्द्रजी!

     
  2. abhinav pandya

    जनवरी 27, 2011 at 6:52 अपराह्न

    these lines remind of one great dictum;” sooraj hoon, gar doob bhi gaya to shafak chood jaunga.”

     
    • Rajendra

      जनवरी 27, 2011 at 10:00 अपराह्न

      बहुत ही सुन्दर रचना की हैं आपने..बहुत अच्छा लगा पढ़ने के बाद..आपके द्वारा ऐसे ही अच्छे अच्छे काम होते रहे..यही भगवत चरणोंमे प्रार्थना..

       

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