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मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् |

24 मार्च

यह बात दीक्षा मिलने के करी दो वर्ष बाद की है । उन दिनों हम गिरगांव (मुम्बई) में रहते थे। मैं दिन का भोजन करती और हर रोज भोजन करते करते ही ध्यान लग जाता। लाख प्रयत्न करती  कि आँखे बन्द न हों, भोजन का समय निकल जाये पर मैं विवश थी। भोजन करते करते यकायक आँखेमून्द जाती थीं। मेरी सासूजी, देवरानियां बडे दुविधाग्रस्त हो उठते थे। अनेक बार सासूजी कहती भी थीं कि,क्या भोजन के समय आँखे बन्द करके बैठ जाती हो?

उस समय भी मैं भोजन की थाली जमीन पर न रखकर लकडी के पाटे पर ही रखकर प्रसाद ग्रहण करती थी। जब भोजन करते करते ध्यान लग जाता और आँखे पुन: खुलती तो मैं देखती थी कि पाटे से करीब 1-2 फ़ीट के घेरे में खाद्य सामग्री बिखरी होती थी। मुझे भोजन के समय ध्यान लगते ही अनुभव होता था कि कोई नन्हा सा कोमल हाथ भोजन के लिए बढे मेरे हाथ को धकेल देता और खाद्य सामग्री बिखर जाती थी। मैं फ़िर हाथ बढाती और मेरा हाथ झटक दिया जाता। ऐसे समय में सासूजी फ़िर टोकती कि बहू आप इस तरह कैसे खाते हो और अनाज को यों क्यों बिखेर देते हो? मुझे कुछ भी समझ में नहीं आता था। वैसे मेरा स्वभाव नहीं रहा कि मिष्टान्न खाऊं पर जब भी खाने के समय ध्यान लगता तो मेरी इच्छा होती कि मैं शक्कर और मक्खन खूब खाऊं । यह क्रम करीब छह माह चलता रहा। जब भी एकादशी आती तो यह कुछ ज्यादा ही होता था। भोजन करते करते आँखे बन्द हो जातीं और एक नन्हा सा बालक भोजन करते दिखाई देता, मेरे हाथ को झटकता, खाद्य सामग्री बिखेर देता। जब आँख खुलती तो वह लुप्त हो जाता। दो – तीन बार मेरे देवर स्व. शशि का ने बताया कि आपकी आँखे जब बन्द होती हैं तो एक झलक के रूप में नन्हा सा एक बालक दिखाई देता है। उसके बाद उस बालक के पगलियों के निशान हर समय दिखाई देते हैं। मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।

एक दिन मैं आसन पर ध्यान में बैठी थी  । ध्यान में सद्गुरुदेव ने कहा- आपके साथ भोजन करने आने वाला बालक और कोई नहीं साक्षात् कृष्ण ही है। नटखट कन्हैया आकर आपके कौर को बिखेर देता है। आपके साथ आपकी थाली में वही नंदकिशोर ही खाने आते है। उसके बाल सुलभ क्रियाकलाप से ही अन्न-भोजन बिखर जाता है ।

ऐसी जानकारी पाकर मेरे आश्चर्य और आनंद का पारवार न था| ध्यान से उठेनेके बाद यह रहस्य मैंने सभी को बता दिया| सभी को बड़ी प्रसन्नता हुई, ऐसा होना अपने आप बंद हो गया|

—आपकी अपनी बा

— प्रभु बा के अनुभव

पूर्वप्रसिद्धी शिवप्रवाह!


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मधुराधिपतेरखिलं मधुरम

यह बात दीक्षामिलने के करीदो वर्षबाद की है । उन दिनों हम गिरगांव (मुम्बई) में रहते थे। मैं दिन का भोजन करती और हर रोज भोजन करते करते ही ध्यान लग जाता। लाख प्रयत्न करती और कि आँखे बन्द न हों, भोजन का समय निकल जाये पर मैं विवश थी। भोजन करते करते यकायक आँखेमून्द जाती थीं। मेरी सासूजी, देवरानियां बडे दुविधाग्रस्त हो उठते थे। अनेक बार सासूजी कहती भी थीं कि,क्या भोजन के समय आँखे बन्द करके बैठ जाती हो?

उस समय भी मैं भोजन की थाली जमीन पर न रखकर लकडी के पाटे पर ही रखकर प्रसाद ग्रहण करती थी। जब भोजन करते करते ध्यान लग जाता औरआँखेपुन: खुलती तो मैं देखती थी कि पाटे से करीब 1-2 फ़ीट के घेरे में खाद्य सामग्री बिखरी होती थी। मुझे भोजन के समय ध्यान लगते ही अनुभव होता था कि कोई नन्हा सा कोमल हाथ भोजन के लिए बढे मेरे हाथ को धकेल देता और खाद्य सामग्री बिखर जाती थी। मैं फ़िर हाथ बढाती और मेरा हाथ झटक दिया जाता। ऐसे समय में सासूजी फ़िर टोकती कि बहू आप इस तरह कैसे खाते हो और अनाज को यों क्यों बिखेर देते हो? मुझे कुछ भी समझ में नहीं आता था। वैसे मेरा स्वभाव नहीं रहा कि मिष्टान्न खाऊंपर जब भी खाने के समय ध्यान लगता तो मेरी इच्छा होती कि मैं शक्कर और मक्खन खूब खाऊं । यह क्रम करीब छह माह चलता रहा। जब भी एकादशी आती तो यह कुछ ज्यादा ही होता था। भोजन करते करते आँखे बन्द हो जातीं और एक नन्हा सा बालक भोजन करते दिखाई देता, मेरे हाथ को झटकता, खाद्य सामग्री बिखेर देता। जब आँखखुलती तो वह लुप्त हो जाता। दो – तीन बार मेरे देवर स्व. शशि का ने बताया कि आपकी आँखेजब बन्द होती हैं तो एक झलक के रूप में नन्हा सा एक बालक दिखाई देता है। उसके बाद उस बालक के पगलियों के निशान हर समय दिखाई देते हैं। मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था।

एक दिन मैं आसन पर ध्यान में बैठी थी  । ध्यान में सद्गुरुदेव ने कहा- आपके साथ भोजन करने आने वाला बालक और कोई नहीं साक्षाकृष्ण ही है। नटखट कन्हैया आकर आपके कौर को बिखेर देता है। आपके साथ आपकी थाली में वही नंदकिशोर ही खाने आते है। उसके बाल सुलभ क्रियाकलाप से ही अन्न-भोजन बिखर जाता है ।

ऐसी जानकारी पाकर मेरे आश्चर्य और आनंद का पारवार न था| ध्यान से उठेनेके बाद यह रहस्य मैंने सभी को बता दिया| सभी को बड़ी प्रसन्नता हुई, ऐसा होना अपने आप बंद हो गया|

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One response to “मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् |

  1. Prof Prakash Khadilkar

    जुलाई 12, 2011 at 7:58 अपराह्न

    Such an expirience indicates that my Guru Maharaj is indicating to me that I must give to others whatever Prasad I am receiving freely from the Lord.
    Here the word Prasad stands for “Serenity i.e.Spiritual Peace .

     

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