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भगवान् श्री दत्तात्रेय के दिव्य साक्षात् दर्शन

28 अप्रैल

परमपूज्य प्रभु ‘बा’ का अनुभव                                                 अमृतानुभव

१० दिसम्बर १९९१ की बात है । रात्रि को भोजन के लिए गुरुभाई प्रसादे मामा के यहाँ भोजन करने जाना था । उन दिनों हम ठाणें में रहते थे । मैं और पुष्पा काकी चलने को द्वार पर आये ही थे कि मुझे अपना सिर भारी भारी सा लगने लगा। मैंने परिवार के सदस्यों से कहा – आप लोग चलो, हम बाद में आ जायेंगे । मैं वापस कक्ष में जाकर लेट गई । लेटते ही ध्यान लग गया । ध्यान से उठी तो रात्रि के करीब १२ बज चुके थे । तभी गुरुवाणी हुई कि उठो और जाकर ध्यानकक्ष में आसन पर जाकर बैठो । अन्य लोगों को आदेश हुआ कि फ़ल, फ़ूल और मिष्टान्न लावें । यह भी उद्घोषणा हुई कि सुगंधा को आज दत्त गुरु के साक्षात दर्शन होंगे । चिरंजीव दत्तप्रसाद, उल्हास भाई उपाख्य स्वामी शिवानंद, अवचट काका, रमणभाई, अरुण मिस्त्री, साधना, योगेश प्रसादे और कईं अन्य साधक न जाने किस प्रेरणा से स्वत: ही पहुँच गये । आदेशानुसार मैं ध्यानकक्ष में आसन पर बैठ गई । कक्ष का द्वार बंद कर दिया गया । बाहर दरवाजे पर दत्तप्रसाद को पीठ सटाकर खड़े रहने को कहा, आसन पर बैठते ही ध्यान लग गया । ध्यान में ही गुरुदेव ने कहा – “अब दर्शन होंगे ।“

यकायक चारों ओर तेज आलोक फ़ैलने लगा । मैंने आँखे खोलने का प्रयास किया पर वें तो प्रकाश के तेज से चौंघिया गई सी लगती थीं । धीरे धीरे भारी आंखों को खुलने में करीब १० मिनट लग गये । आँखे खुली तो देखा कि दरवाजे पर एक सुनहरा प्रकाशपुंज है । वलयाकार में घूमता प्रकाश । धीरे धीरे उस घेरे में साक्षात् दत्तगुरु प्रकट होने लगे । कद करीब सवा छह फ़ीट , तीन मुख, छह हाथ, भगवे रंग का चोला, खडाऊ के रूप में चरणपादुकाएं धारण किये हुए, गले में रुद्राक्ष की चार मालाएं , हाथों की कलाइयों पर दो-दो रुद्राक्ष मालाएं, हाथ में चक्र , कमल पुष्प, कमंडलु, त्रिशूल, गदा और एक दाहिना हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में । सचमुच में वैसे ही जैसे चित्रों और मूर्तियों में दिखाई देते हैं । हाथ का चक्र तीव्र गति से घूम रहा था, दत्तगुरु के पीछे एक धवल गाय, जिसके कान हिल रहे थे, ऐसी सुदर्शन गाय मैंने पहले कभी नहीं देखी, दत्तगुरु के मुख से तेज दमकता हुआ, मानो कोई स्वर्णप्रकाशित, आभावान्, दैदीप्यमान जीवंत प्रतिमा खड़ी हो । फ़िर दो हाथ प्रकट हुए। कक्ष के दरवाजे से ही हाथ अपने आप लम्बे हो गए और एक हार हवा में से ही लेकर मेरे गले में डाल दिया । ऐसे ही फ़लों में से एक संतरा उठायाऔर हाथ की अँगुली से उसे काटा,  एक फ़ांक निकाली और मुझे खिलाई । न जाने किस चमत्कारी ढंग से संतरा काटा गया कि उस पर कोई निशान तक नहीं था । तदुपरांत मिठाई के थाल में से एक टुकड़ा खिलाया और वह दिव्य आभा चारों ओर बिखरे प्रकाश में ही विलीन होने लगी । अंतर्धान होते होते वह प्यारी सी छवि एक पतले से दण्ड जैसी बन गई । निरंतर विलीन होती छवि एक ज्योति में परावर्तित हो गई । वह ज्योति मेरी ओर बढ़ी । समीप और समीप आकर वह मेरी भृकुटि से टकराई और मैंने देखा कि वह मेरे शरीर में विलीन हो गई। ज्योति के शरीर में प्रविष्ट होते ही मेरा शरीर तपने लगा और वापस मुझे ध्यान लग गया। ध्यान  में ही गुरुदेव ने मुझे कुछ आदेश दिये । इसमें से एक मुख्य आदेश था – गांव गांव, गली -गली जाकर सत्संग करने का ।

ध्यान खुला तो रात्रि के २ बज चुके थे । आवाज लगने पर दरवाजा खोला गया । बाहर सभी साधक और परिजन व्यग्रतापूर्वक राह देख रहे थे । द्वारपाल बने दत्तप्रसाद को इस अवधि में २ बार पदचाप सुनाई दी और ध्वनियाँ ऐसी जान पड़ी मानो कोई भारी वस्तु फ़र्श पर रखी गई हो । उसे आज भी फ़र्श का वह कम्पन और उस ध्वनि का आभास है ।

इसके बाद मेरे शरीर में कम्पन और थकान का अनुभव हो रहा था । गले का हार निकालकर गुरुदेव के चित्र के पास टांग दिया गया । वह एक अद्भुत हार था । सभी फ़ूल अलग अलग किस्म के, दिखने में कमल जैसे, आकार में जास्वंद जैसे और उनकी पंखुड़ियां क्रेप कागज जैसी । यह हार लगभग 1 वर्ष तक ताजा ही बना रहा । इसके बाद साधिका रानी ( स्मिता गद्रे) ने ठीक वैसा ही कपड़े का हार बनाया और उसमें इस दिव्य हार को पिरो दिया गया ।

पूर्वप्रसिद्धी – शिवप्रवाह नोव्हेंबर २००८.

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4 responses to “भगवान् श्री दत्तात्रेय के दिव्य साक्षात् दर्शन

  1. Dr.Deepak Acharya

    दिसम्बर 1, 2014 at 4:58 अपराह्न

    Good Om Draam

     
  2. Prof Prakash Khadilkar

    जुलाई 12, 2011 at 8:24 अपराह्न

    Main Conclusion of the experience is to spread the word. Let every one experience the peace and tranquility which we have received through the grace of Maharaj.

     
  3. Gautam Chulet

    जुलाई 8, 2011 at 10:35 अपराह्न

    moksh mukam sat guru baa sarnam.

     
  4. Gautam Chulet

    जुलाई 8, 2011 at 10:32 अपराह्न

    jai guru dev ………………..

     

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