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वागीश्वरी (हिंदी)

11 मई

काफ़ी सालोंसे एक सुंदर सरस्वतीवंदना हम सुनते थे । जय शारदे वागीश्वरी!

मराठीमें रचना करनेवालों में अग्रणी श्रीम. शांताबाई शेळके ने इसे लिखा है, गाया था आशाजी ने और श्रीधर फ़डकेजी ने इसे संगीतबद्ध किया था । इसे सुनना एक दिव्य काव्यानुभव है ।

इस संस्थल का नाम ‘वागीश्वरी’ क्यों ? यह प्रश्न मुझे काफ़ी लोगोंने पूछा । इस का जवाब इस कविता में है ।

मै जब जब अपनी परमपूज्य गुरु प्रभु ‘बा’ के छायाचित्र देखती हूं, एक दो बार उनकी आवाज सुनने का सौभाग्य मिला, मुझे हर बार वे साक्षात सरस्वती का रूप महसूस हुई।

‘वागीश्वरी’ का एक अर्थ है ईश्वर की वाणी. अपने गुरु की वाणी तो हमारे लिए साक्षात् ईश्वरी वाणी ही है । दूसरा अर्थ है देवी सरस्वती…विद्या की देवता ! अपना जाड्य , आलस दूर करने वाली, हमें कार्यप्रवण करने वाली देवता ! इस कवितामें जो वर्णन आया है पूरी तरह से अपनी गुरु परमपूज्य प्रभु बा के लिए उचित लगता है ।

सरस्वती साक्षात ब्रह्मदेव की कन्या है, विद्या धारण करनेवाली देवता है । ज्योत्स्ना याने चांदनी जैसी आपकी कांती है, आपका मुख शारदीय चंद्रमा जैसा सुंदर है । आपकी हंसी से चारो युगों की पूनम का उजाला छा जाता है ।

आपकी कृपा की चांदनी हरदम हमारे सिर पर बरसती रहे ।

आपकी चतुर और कलामय अंगुली जब जब वीणावादन करती है तो नया संगीत जनम लेता है । कल्पवृक्षपर खिलने वाले फ़ूलों की तरह नई नई कल्पनाएं अंकुरित होती है । सृजनशीलता जागृत होती है । बुद्धिमांद्य नष्ट हो जाता है । चेतना का संचार होता है ।

हे देवते, सारे शास्त्र , विद्या, कला, संस्कृतियाँ आपको वश है । आपके प्रतिभस्पर्श से रुचिर कलाकृतियां जन्म लेती है,  आपके क्रियाकलाप से ही इस विश्व की अनूठी  लावण्ययात्रा देखने भाग्य प्राप्त होता है ।

यही तो हमारी गुरु हमारे लिए कर रही है ! जय शारदे ‘वागीश्वरी’!

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One response to “वागीश्वरी (हिंदी)

  1. rani

    मई 19, 2011 at 11:46 पूर्वाह्न

    उत्तम ! हमें भी ऐसाही लगता है !!
    जय श्री कृष्ण

     

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