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सौ बातों की एक बात…श्री. वरदीचन्द राव

12 मई

बा के पास जब भी कोई साधक जाता है तो सबसे पहले मधुर मुसकान से वे उसके क्लांत मन के सभी क्लेश हरने का उपक्रम करती है। तत्पश्चात् उसके तन की नीरोगता की पूछ परख होती है । साथ साथ परिवार, व्यवसाय आदि की खोज – खबर भी चलती है। बाद में स्थानीय साधकों के बारे में जानकारी होती है । थोडी देर समीप बैठने के बाद बा का प्रश्न होता है – ध्यान कैसा चल रहा है?

पहले मुसकान, फ़िर विविध व्यवहार की बातों का ज्ञान और अंत मे ध्यान, लगता है ये बा के सत्संग के दिखते हुए आधार है। यों तो बा के मंतव्यों के बारे में अनुमान करना असंभव हैं क्योंकि सम्बोधिप्राप्त सद्गुरु के पास सभी साधकों के उत्थान के अलग अलग क्रियाकलाप होते हैं। पर ध्यान को हर बार रेखांकित करने के पीछे इसकी महत्ता स्वयंसिद्ध है ।  बा अपनी बात में कहते भी रहती हैं – ‘ध्यान करो भाई ध्यान करो, गहरा गहरा ध्यान करो’ ।

इस गहरे ध्यान का क्या अर्थ हो सकता है? सिद्धों की भाषा सांकेतिक होती है, वहां पर शब्द नहीं संकेत से होने वाली चोट पर जोर रहता है । ध्यान की गहराई संभवत: मन के मैल को धोने के लिए है जिससे निर्मलता का आविर्भाव अवश्यंभावी है । यह निर्मलता आत्मिक पवित्रता का पर्याय है । जहाँ पावनता होगी वहाँ दैवी शक्ति का प्राकट्य तो होना ही है । जब हमारी शक्ति जगेगी, सक्रिय होगी तो शिव की उपस्थिति स्वत: हो जायेगी । शिव की उपस्थिति स्वयं में पूर्णता है । संयोजन करते हुए देखें तो लगता है कि इन सब सम्प्राप्तियों की कुंजी तो ध्यान ही है । ध्यान जब गहराता है तो साधक आनंद में लहराता है । यही आनंद  हर सांस में बसने पर स्वयं शिव होने की तैयारी होती है ।

कभी लगता है, बा ध्यान के सूत्र से सभी साधकों में शिवत्व का संचरण करना चाहती है, इसलिए प्रारंभ वे मुसकान करती हैं और इंगित ध्यान का करते हैं। अर्थात् मार्ग सरल समझो तो सरल है और कठिन मानो तो कठिन । हमारे कल्याण के लिए यह कितनी चिन्तित है? क्या कोई  ऐसा अन्य मिलेगा? लगता है कि पूर्व जन्म का संबंध निभा रही हैं बा हमसे, हमें असीम उँचाइयों पर ले जाने को सन्नद्ध है बा, इसलिए हमें उनके संकेतों को समझने की मेधा जाग्रत करना है। और गहरे तल तक ध्यान को ले जाना है ।

यह एक कयास है, क्योंकि आध्यात्मिक मार्ग में समझने  का प्रयास भी नासमझी का ही द्योतक है । जो कहीं पहुँचना चाहता है वह कहीं नहीं पहुँचता । इसलिए न अनुमान चाहिए, न प्रयास चाहिए, न ही कयास। बस सद्गुरु ने हमारे लिए उचित समझ कर जो आदेश दिया है उसका संज्ञान चाहिये, इसलिए सौ बातों की एक बात है-

सद्गुरु आज्ञा का अक्षरश: परिपालन । उसी निर्देशन में जीवन का संचालन!

पूर्वप्रसिद्धी ——जुलै 2009 – शिवप्रवाह –

संपादकीय- श्री.वरदीचन्द राव विचित्र.

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