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जानने की बात

19 मई

जानने की बात

                                                                              …… श्री. वरदीचन्द राव, संपादक शिवप्रवाह

योगियों के अनुसार यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये राजयोग के विभिन्न सोपान हैं । यम का अर्थ है- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह । इस यम से चित्तशुद्धि होती है । शरीर, मन और वचन के द्वारा कभी किसी प्राणी की हिंसा न करना या उन्हें क्लेश न देना यह अहिंसा कहलाती है । यथार्थ कथन को ही सत्य कहते हैं। चोरी से या बलपूर्वक दूसरे की चीज को न लेने का नाम ही है अस्तेय । तन – मन और वचन से सर्वदा सब अवस्थाओं में मैथुन का त्याग ही ब्रह्मचर्य है । अत्यन्त कष्ट के समय में भी किसी मनुष्य से कोई उपहार ग्रहण न करने को अपरिग्रह कहते हैं । नियम अर्थात नियमित अभ्यास और व्रत का परिपालन । तप, स्वाध्याय, संतोष, शौच और ईश्वरप्रणिधान इन्हें नियम कहते हैं। आसन के बारे में यही समझ लेना चाहिए कि वक्ष:स्थल, ग्रीवा और सिर को सीधे रखकर शरीर को स्वच्छन्द रीति से रखना ही आसन है । प्राणायाम शब्द दो शब्दों के मेल से बना है । प्राण का अर्थ है, अपने शरीर के भीतर रहने वाली जीवन शक्ति और आयाम का अर्थ है, उसका संयम । प्राणायाम तीन अंशो में विभक्त है – रेचक, पूरक और कुंभक। अनुभवशक्तियुक्त इन्द्रियों लगातार बहिर्मुखी होकर काम कर रही हैं और बाहर की वस्तुओं के सम्पर्क में आ रही हैं । उनको अपने वश में लाने को प्रत्याहार कहते हैं । अपनी ओर खींचना या आहरण करना – यही प्रत्याहार शब्द का प्रकृत अर्थ है ।

हृत्कमल में या सिर के ठीक मध्यदेश में या शरीर के अन्य किसी स्थान में मन को धारण करने का नाम है धारणा । मन को एक स्थान में संलग्न करके, फ़िर उस एकमात्र स्थान को अवलम्बनस्वरूप मानकर एक विशिष्ट प्रकार के वृत्तिप्रवाह उठाये जाते हैं, दूसरे प्रकार के वृत्तिप्रवाह क्रमश: प्रबल आकार धारण कर लेते हैं और ये दूसरे वृत्तिप्रवाह क्रम होते होते अन्त में बिल्कुल चले जाते हैं, फ़िर बाद में उन प्रथमोक्त वृत्तियों का भी नाश हो जाता है और केवल एक वृत्ति वर्तमान रह जाती है । इसे ध्यान कहते हैं और जब इस अवलम्बन की भी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती , सम्पूर्ण मन जब एक तरंग के रूप में परिणत हो जाता है, तब मन की उस एकरूपता का नाम है समाधि

प.पू. राजयोगी प्रभु ’बा’ को ऐसी ही समाधि लगने के कारण ही परमहंस का पद प्राप्त हुआ है । वह योगाग्नि मनुष्य के पापपिंजर को दग्ध कर देती है । तब तत्त्वशुद्धि होती है और साक्षात निर्वाण की प्राप्ति होती है । ’बा’ का मार्ग भी ध्यान व योग का मार्ग है जिसमें चलते हुए योगी स्वयं को तथा सारे जगत को भगवद्स्वरूप में देखता है ।  ……. वरदीचन्द राव.

पूर्वप्रसिद्धी – शिवप्रवाह फेब्रुवारी २००८.

अष्टांगयोग – योगसूत्र

योग के ८ अंग – यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोSष्टावङ्गानि॥१॥

यम- अहिंसात्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा : ॥२॥

नियम- शौचसंतोषतप:स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमा : ॥३॥

आसन- स्थिरसुखमासनम् ॥४॥

प्राणायम- तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेद : प्राणायाम:: ॥५॥

प्रत्याहार- स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहार: ॥६॥

धारणा-  देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ॥७॥

ध्यान- तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम् ॥८॥

समाधि- तद एवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यम् इव समाधि: ॥९॥

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