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अखंड स्नेह स्रोतस्विनी को नमन…श्री. वरदीचन्द राव

20 मई

आत्मीयता का असीम विस्तार

अनवरत झरता वात्सल्य

स्नेहसिक्त रश्मियों से

आलोकित प्रकाशपुंज ।

राजयोग की कीर्तिस्तंभ

साधना के प्रवाह से अभिसंचित

सरस-सधन-संघनित अध्यात्मकुंज ।

अंतर्ज्योति को जाग्रत करती

संचेतना का सामुद्रिक -ज्वार ।

संसर्गियों को भीतर तक आर्द्र करती

सत्संग की सुरसरि -धार ।

आभा, प्रभा और शोभा का सिंधु,

त्रितापों का शमन करती मलयपवन ।

संकल्प – सरोवर की निर्मल लहर

शक्तिपात का दैवी आचमन ।

जीवन को समिधासम कर

परकल्याण में रत तेजस्विनी प्रभु बा ।

परम्परा में आपने अपनी क्षमता से

एक नूतन इतिहास रचा।

इतिहास को नमन, अध्यात्म को नमन,

अपनत्व को नमन, सतत्व को नमन,

साधना को नमन, आराधना को नमन,

लब्धि को नमन, उपलब्धि को नमन

शक्ति के प्रभंजन को नमन

भक्ति के स्पंदन को नमन

नमन हर क्षण को, नमन कण कण को

नमन तुम्हारी स्मिता को।

नमन तुम्हारे में रमे परमपिता को ।

जो देता है हमें दिशाज्ञान।

कराता है आत्मानुसंधान ।

यही खोज हमें आत्मा से

परमात्मा में रूपांतरित कर देगी ।

नाम जप व योग साधना तभी तो सधेगी ।

सधा हुआ जीवन,

जीवन की साध बन जाए ।

आस्था घनीभूत होकर,

तात्त्विक सांद्रता बरसाए ।

इसलिए इतनी कृपा करना प्रभु,

बा को दीर्घायु करना ।

ताकि अनंतकाल तक अजय रूप से

हँसता, गाता बहरता रहे

यह आध्यात्मिक झरना।


बा के जन्मोत्सव पर येउर में 25 मई 2008 को सभी साधकों की भावना को समाहित कर व. राव द्वारा पठित आस्था काव्य.

पूर्वप्रसिद्धी शिवप्रवाह- जून 2008.

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