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अध्यात्म के सुमन की सुगंध…श्री. वरदीचन्द राव.

22 मई

राजमहिषी जैसे आभायुक्त वस्त्र, विविधांग आभूषणों से सज्जित, वैभवपूर्ण आसन । यह किसी प्रतिमा का वर्णन नहीं हैं । यह है बा का भौतिक रूप । हर नवागंतुक पहली बार देखता है तो ठिठक सा जाता है । उसके अंतस् में पहला प्रश्न उगता है – संत होकर इतना बनाव-शृंगार क्यों?

तत्पश्चात् जब उसकी दृष्टि ’बा’ के मुखमण्डल पर टिकती है तो वह पाता है – एक सौम्य व संकर्षित करती मुसकान, अपनेपन से लबरेज आँखे, समक्ष बैठे हरेक व्यक्ति के मानस- अंधकार को विदीर्ण करता तेज, आशीर्वाद लुटाते हस्त – पद्म और अपने में समा लेने का अद्भुत निमंत्रण। तब दूसरा प्रश्न उगता है -कैसे?

क्यों और कैसे की ऊहापोह में उसे बा के संसर्ग में अल्पावधि बीत चुकी होती है । इस सन्निधिकाल में बा के सद्भाव तरंगायित होकर वातावरण को प्रेममय कर देते हैं। अनुभव होती है एक ताजी सुगंध, जिसे अध्यात्म के सुमन की सुगंध कहना सटीक होगा। फ़िर प्रश्न सो जाते हैं । पूर्व में अंकुरित प्रश्न अपना रूप बदलकर श्रद्धा में और श्रद्धा अपना शृंगार कर आस्था में बदलने लगती हैं। किसी को पता ही नहीं चलता यह हो गया-कब?

क्यों , कैसे और कब? इन तीन सूत्रों को समझना ही बा को समझने का प्रथमिक प्रयास है। इन तीन पर ही अधारित है बा के वासुदेव कुटुम्ब की अवधारणा और उनके द्वारा निर्मित स्नेह का आकाश।

जैसे देव-प्रतिमा का भक्तगण चाहे जैसा शृंगार करें, कितने ही लकदक आभूषण धराये, कितना ही भव्य सिंहासन लगाये, प्रतिमा है अनजान, प्रतिमा है अनासक्त, प्रतिमा है निर्लिप्त । यह सारा कार्य तो भक्त का अनुरंजन है । ठीक ऐसा ही अनुरंजन प्यारे पुत्रों को मिले इसलिए बा ने इसे स्वीकारा है ।

बा शक्तिरूपी शिव और शक्तिरुपी सुगंध का सुमेल है । बा शिव का प्रवाह है , बा शिव और शक्ति के सामंजस्य का आल्हादक स्वरूप है । एक दीप से जले दूसरा यह भाव भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन का आधार रहा है । बा में दीपक, बाती और तेल तो जन्मत: ही परमात्मा ने रच दिये थे । इस दीपक में ज्योति परमपूज्य  योगीराज गुळवणीजी महाराज ने स्वयं अपने दीपक से प्रज्वलित कर दी । इससे इस दीपक में समा गई एक शीतल चांदनी, एक दिव्य तेज, एक झिलमिलाहट और गजब का गुरुत्वाकर्षण।

यह आकर्षण जब श्रद्धालु के मन को कर्षित करता है, तन को रोमांच से भरता है , बुद्धि को स्पंदन देता है, भावों को वंदन देता है, तब एक विलक्षण घटना घटित होती है। मैं और मेरा तिरोहित होकर अध्यात्म की बयार में उड़ जाता है, साधक मुक्ति के कैलास की ओर मुड़ जाता है । फ़िर क्यों, कैसे और कब का उत्तर पाना हेतु नहीं रहता, हेतु अपना प्रदर्शन भी नहीं रहता, मंतव्य बा का दर्शन भी नहीं रहता, फ़िर तो बा स्वतं उतर आती है उसके हृदपटल पर, उसे हर क्षण उनकी उपस्थिति की अनुभूति होती है, अपने अंतर्मन में रमते सद्गुरु को देख – देखकर उसकी आँखों में अश्रुझड़ी लग जाती है , ये आँसू अतिशय खुशी के होते हैं। ऐसे में साधक की दशा होती है शून्य, निर्विकल्प, निराशय और कभी -कभी निराकार भी ।

तब बा के नाभिकमल से उगते सरोज की पंखुड़ियों पर साधक स्वयं आरूढ़ होकर उनके विराट – दर्शन का सुख पाता है । यही क्षण सद्गुरु और सच्छिष्य के मिलन का ऐतिहासिक क्षण हो जाता है, यह मिलन शाश्वत बन जाता है, यह मिलन सनातन हो जाता है । इससे सिद्धि नहीं सिद्धता प्रकट होती है, दैन्यता नहीं दिव्यता का आविर्भाव होता है और शिवोऽहं का मंत्र स्वयंसिद्ध हो जाता है ।

फ़िर बा को न तो समझना शेष होता है और न ही समझने की आवश्यकता। बा और साधक में भेद ही विलुप्त  हो जाता है । अध्यात्म के सुमन की सुगंध से सराबोर साधक अपने आप में मगन होकर परमात्मा के छोर को पा लेता है, बा का संकल्प भी पूरा हो जाता है, यह आद्यशक्ति साधकों के दीप प्रज्वलित करने ही तो अवतरित हुई है । …………श्री. वरदीचन्द राव.—संपादक शिवप्रवाह

पूर्वप्रसिद्धी  शिवप्रवाह मे 2009

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