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आओ, अन्तर्यात्रा करें |

24 मई

आत्मा और बुद्धि दोनों भिन्न तत्त्व हैं । आत्मा चेतन ‘पुरुष’ है और बुद्धि अचेतन ‘प्रकृति’ का अंग ।

किन्तु जब आत्मा बुद्धि से युक्त होता है वह ‘ध्याता’ या ‘द्रष्टा’ कहलाता है, क्योंकि बिना बुद्धि के वह कुछ जान ही नहीं पाता ।

चित्त पर बाह्य जगत् के विषयों का प्रतिबिम्ब प्रभावी होने से वह कभी शांत कभी अशांत तो कभी विमूढावस्था में होता है । आत्मा इनका द्रष्टा बन करके अपने मूल स्वरूप को विस्मृत किए हुए है। अध्यात्म जगत् में अनेक साधकों की मान्यता है कि श्रवण, मनन व निदिध्यासन द्वारा मोक्ष की सम्प्राप्ति संभव है । पर चित्त शुद्धि के बिना श्रवण, मनन व निदिध्यासन फ़लीभूत होना संदिग्ध है। चित्त की शुद्धि के लिए ही शक्तिपात योग-साधना है, अत: मोक्षगमन के आकांक्षी के लिए यह योग – साधना अति आवश्यक है ।

चित्त पर बाह्य विषयों का प्रतिबिम्ब मन और पंचेंन्द्रियों के द्वार से प्रविष्ट होता है । यह बहिर्मुखी अवस्था होती है, जब वे अंतर्मुखी हो जाते हैं तो विषयों से इनका संबंध टूट जाता है । हमारी बुद्धि महत्तत्त्व के एक बुदबुदे के समान है । इसीलिए ईश्वर को सर्वज्ञ और जीव को अल्पज्ञ कहा गया है। जीव जब ईश्वर का ध्यान करता है तब उसकी गति बुद्धि से ऊपर उठकर महत्तत्त्व में हो जाने से वह अपने बुद्धिगत संस्कारों से मुक्त हो जाता है । कुण्डलिनी शक्ति के जाग्रत होने पर भक्ति, योग, ज्ञान इत्यादि का भेद विलोपित हो जाता है । सभी साधनारूपी सरिताएं साधनरूपा सागर में मिल जाती हैं, इसी को महायोग कहते हैं ।

प्रत्येक मनुष्य में ईश्वरीय शक्ति विद्यमान है । यह शक्ति जब तक अपने मूल कारण और उद्गम को भूलकर जगत की भौतिकता में उलझी रहती है उसे बहिर्मुखी अवस्था कहते हैं । नानाविध सांसारिक कार्य और पूजा-पाठ, कथा- कीर्तन, वाचन, मंत्रोच्चार, जप आदि सभी बाह्यकर्म ही हैं, हम चाहे इन्हें जीवनभर करते रहें पर ये क्रियाएं मात्र होती हैं, किन्तु शक्ति जाग्रत होकर अंतर्मुखी हो जाए तो ध्यान लगता है, शक्ति अपने मूलस्थान से ऊपर उठकर सहस्रदल में स्थित शिव से संयोग को तत्पर होती है। साधक को अनुभव होना शुरु होता है । शक्ति एक बार जाग्रत हो जाने पर वह कार्यहीन नहीं रहती उसके प्रभाव सतत घटित होते रहते हैं । साधक की अंतर्यात्रा प्रारंभ हो जाती है । वह अपनी बहिर्दृष्टि को समेटता हुआ भीतर की गहराइयों में  डूबता जाता है । चित्त की शुद्धि का क्रम गति पा लेता है, वासनाएं क्षीण होने लगती हैं एवं जीव मुक्ति के राजमार्ग का अग्रसर हो जाता है। –अपनी ही ’बा’

पूर्वप्रसिद्धी- शिवप्रवाह फेब्रु. २००८.

Note:1

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः |

‘चित्त’ की तीन प्रकारकी वृत्तियॉं है| क्षिप्त, विक्षिप्त और मूढ . इनका निरोध करना, चित्त को स्थिर करना यही योग है ऐसी योग की व्याख्या भगवान पतंजलीने अपने योगसूत्र में की है |

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One response to “आओ, अन्तर्यात्रा करें |

  1. Rucha Rajesh Phatak

    फ़रवरी 5, 2012 at 6:24 पूर्वाह्न

    श्री गुरुदेव दत्त.
    आपली वेब साईट पाहिली
    मनाची एकाग्रता कशी करावी आणि साधन मार्गात प्रगती साठी माझे सद्गुरू श्री परम पूज्य श्री दत्त महाराज कवीश्वर यांचे चरणी संपूर्ण शरणागती कशी करावी ?
    हे आपण मार्गदर्शन करावे… हि आपल्या चरणी नम्र प्रार्थना
    आपली कृपाभिलाषी
    ऋचा फाटक
    GOA

     

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