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सद्गुरु और अनुभव

02 जून

सद्गुरु और अनुभव भले ही दो अलग- अलग शब्द दिखाई देते हों किन्तु मेरे सोच और समझ में ये दोनों एक दूसरे से अभिन्न हैं । वास्तविकता तो यह है, कि सद्गुरु शब्द का अर्थ ही अनुभव से समझ में आता है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि अनुभव पहले होता है, फ़िर सद्गुरु प्रकट होते हैं । अगर गौर करें तो पायेंगे कि प्रत्येक साधक के जीवन में अनुभवों की शृंखला, एक कड़ी पहले आती है । अनेक छोटी छोटी घटनाएं एक के बाद एक घटती अनुभव होती हैं। हर साधक के जीवन में सद्गुरु के प्रकट होने का समय पहले से ही तय है। निमित्त कुछ भी हो सकता है, चाहे वह स्थान हो, परिस्थिति हो या कोई अन्य, किन्तु मिलन का क्षण पूर्व निर्धारित है। यों तो हम चाहकर भी सद्गुरु को नहीं खोज सकते हैं क्योंकि हमारे पास वह आँख, वह दृष्टि, वह परख है ही नहीं । हो भी कैसें?

स्वयं सद्गुरु अपने आप शिष्य को खोजते हैं, उसे आवाज लगाते हैं, उसे अपनी पहचान बताते हैं, उसे इस बात का प्रमाण देते हैं कि वे ही वह परमसत्ता है जिसकी तलाश की कामना शिष्य के मन में उठी थी । यह बात अलग है कि वह पुकार, वह संकेत, वह संदेश वह क्रिया न तो शिष्य को दिखाई देती हैं और न शिष्य के अलावा किसी अन्य को भनक ही होती है । बस अपने आप मन के तार झंकृत होने लगते हैं, भीतर ही भीतर आनंद का स्रोत बहने लगता है, उन्मना भाव जाग्रत होने लगता है, इसी घटनाक्रम को अनुभव कहते हैं । अनुभव से ही शिष्य अपने सद्गुरु को पहचान लेता है ।

साधक अनुभवों से ही सद्गुरु शब्द की सत्ता व अर्थ समझता है । अनुभवों से बोध होता है । अनुभवों से ज्ञान मिलता है। अनुभवों से विश्वास बढ़ता है । अनुभवों से विवेक आता है । अनुभव ही सद्गुरु की सामर्थ्य का, उसकी उपस्थिति का, उसकी असीम शक्ति का अहसास कराता है । सद्गुरु के बिना अनुभव होना असंभव है इसीप्रकार सद्गुरु हो और अनुभव न हों यह भी असंभव है ।

स्वयं के अनुभव से प्राप्त ज्ञान ही सच्चा आत्मज्ञान है । उधार का ज्ञान तो बिखरा पड़ा है, वह तो कहीं भी मिल जाएगा । ऐसे बासी ज्ञान की चर्चा करने वाले भी अनेक मिल जायेंगे । लेकिन ऐसा ज्ञान केवल तर्कों और भाषणों में ही काम देता है, वह बुद्धिविलास ही है, उससे कुछ भी हासिल नहीं होता है । हां उससे अहंकार जरूर जन्म सकता है, वह अहंकार पुष्ट होकर पनपेगा भी, वही अहंकार उसके धारणकर्ता का घात ही करेगा । इसके विपरीत अनुभव से प्राप्त ज्ञान साधक में विनम्रता लाएगा । अहंकार उसे छू भी नहीं सकेगा । जो साधक एक बार भी उस असीम को लख लेगा, उसे महसूस कर लेगा वह यह भी निर्णय कर लेगा कि असली ज्ञान कौनसा है? उसे कण और मण का विवेक हो जाएगा । फ़िर अहंकार टिकेगा कहां? अहंकार के लिए स्थान ही कहां रहेगा? इसीलिए ज्ञान के लिए अनुभव का सम्बल आवश्यक है और यह ध्रुव सत्य है कि अनुभव के लिए सद्गुरु का होना जरूरी है ।

सद्गुरु केवल अनुभव देते हैं । पात्रता विकसित हो तो अनुभवों की झड़ियां लगा देते हैं । सद्गुरु कभी ज्ञानी होने का दावा नहीं करते और न जाहिर तौर पर कभी ज्ञान की बातें करते ही दिखाई देते हैं । सद्गुरु हमेशा मौन ही रहते हैं, उनके पास शब्दों की कमी हर समय रहती हैं । उन्हें ज्ञात है कि जो खज़ाना उनके पास है उसे शब्दों में व्यक्त की नहीं किया जा सकता तो फ़िर शब्द साधना क्यों?  उनके पास तो अनुभवों का अकूत खज़ाना होता है । वे शब्दों के बजाय अनुभव देंगे, अनुभव के अलावा कोई छोटी – मोटी वस्तु उनके पास है ही नहीं । वे रखना भी नहीं चाहते ।

जिसे अनुभव मिल जाता है, उसे फ़िर किस चीज की दरकार होगी? अनुभव आते ही साधक तो परमानंद में गोते लगाने लगेगा, मस्ती और आनंद में झूमता मिलेगा, व्यर्थ की चर्चाओं और कामों के लिए उसके पास वक्त ही कहां मिलेगा? दुनियाई लोग उसे दीवाना कहे, पागल कहे पर वह होगा सयानों में सयाना । वह किसी भी विषय में तर्क नहीं करेगा, किसी वाद- विवाद में नहीं पड़ेगा, किसी परिभाषा से बंधेगा नहीं, वह सभी के बीच रहते हुए भी अकेला ही होगा, न उसे किसी समर्थन की आवश्यकता है और न किसी के विरोध की परवाह । उसे किसी से किसी प्रकार के प्रमाण-पत्र, मान्यता की भी अपेक्षा नहीं । न उसे अपनी प्रतिष्ठा चाहिए और न किसी का आकलन करने की उसकी इच्छा । वह तो गाता, गुनगुनाता गुजरता दिखाई देगा। दु:ख – दर्द और मायूसी उसे छू तक नहीं सकेंगे । उसके चेहरे पर अलौकिक तेज जगेगा । यही तो है असली ज्ञान का तेज, असली साधना का तेज ।

इसीलिए तो मैं बार- बार, हर पल सभी साधकों से यही कहती हूं कि बहुत हो गई बातें, बहुत पढ़ और रट लिया, बहुत सुन लिया । अब तो अनुभव की यात्रा प्रारंभ करो, अब तो अनुभव के जगत की सैर करो, अब  तो अनुभव, बस अनुभव करो मेरे भाई । ध्यान करो भाई ध्यान करो, गहरा गहरा ध्यान करो । जय श्रीकृष्ण।                                                         ………………आपकी अपनी बा

 पूर्वप्रसिद्धी शिवप्रवाह जाने २००७
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