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ध्यान

10 जून

बा के आशीर्वाद

जीवन का आधार है श्वास । सबसे सूक्ष्म है श्वास । तुम्हारी वृत्तियों की नियंत्रक है श्वास । साधना का सहज साधन है श्वास और आश्चर्य की बात है कि सबसे उपेक्षित है श्वास । उपेक्षित इस दृष्टि से नहीं कि तुम इसका उपयोग नहीं करते, वरन् इस दृष्टि से कि तुम्हें श्वास लेने की सुध ही नहीं है । श्वास पर तुम्हारे द्वारा कभी ध्यान ही नहीं दिया है। तुम आनंद में होते हो, क्रोध में होते हो, प्रेम में  होते हो, आराम में होते हो, भक्ति में होते हो,  भौतिक जगत् के आकर्षण में होते हो,  या अन्य किसी उपक्रम में होते हो,  तो आपकी श्वास अलग -अलग होती है । जैसे जैसे श्वास बदलती है मन के भाव भी रुपांतरित होते जाते हैं । मन को बदलना हो तो श्वास को बदल लो । श्वास बदलना आसान है, अत: मन को बदलना भी सरल है ।

तुम अपनी आती – जाती श्वास को देखो, कैसे श्वास ले रहे हो इसे परखो, इसे भीतर लेने और बाहर निकालने में कितना समय लेते हो इसे जाँचो, यही हँसता, खेलता, रसीला ध्यान है । जब यह ध्यान सध जाता है तो तुम इतना निर्भार हो जाते हो, शीतल और शान्त हो जाते हो कि अपना अस्तित्त्व तिरोहित हो जाता है । अस्तित्त्व का तिरोहण ही साधना का मधुर फ़ल हैं । सच तो यह है कि तुम्हारा अस्तित्त्व  कुछ और नहीं, एक दर्पण है | जिसमें तुम्हारा ही प्रतिबिम्ब रुपायित होता है| जो महज काल्पनिक होता है| वैसे ही अपने अस्तित्व को त्याग मन को सत्य की खोज में लगा लो–यही उपासना है।—तुम्हारी अपनी ’बा ’

पूर्वप्रसिद्धी शिवप्रवाह – अप्रैल 2007

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