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जो पाता है, वो छुपाता है

11 जुलाई

बात गिरगाँव निवास के काल की है, उस दिन श्रावणी सोमवार था । मैं भोले बाबा को दूध, दही आदि चढ़ाने शिव-मंदिर गई थी। आते समय शाक- भाजी, फ़ल-फ़ूल, बिल्वपत्र आदि लेते-लेते देर हो गई । श्रावण में सभी शाम को ही भोजन करते थे तो पुष्पा काकी ने सारी तैयारियां कर ली थीं बस सब्जी बनाना ही बाकी था। काम निपट गया था तो मैं ध्यान में बैठ गई । सायं लगभग 6 बजे का समय था । खूब गहरा ध्यान लगा। ध्यान में मुझे अपना ही कक्ष दिखा । कक्ष के मध्य में काला व मनमोहक शिवलिंग दिखा । मुझे उल्लास हुआ और मैं दौड़कर उससे लिपट गई। सहसा मुझे आभास हुआ कि मैंने किसी की कमर पकड़ रखी है। धीरे -धीरे लगने लगा कि पैर, घुटने आदि भी हैं । नजरें उठाकर देखा तो साक्षात् विठ्ठल । काला वर्ण, कपाल पर गंध-लेपन । मैं सोचने लगी- इन पर बिल्वपत्र अर्पण करूं या तुलसीपत्र? मैं तो शिव-पूजा में लगी थी विठोबा कहाँ से प्रगट हो गए? सजगता से देखने लगी तो कभी शिव दिखते तो कभी विठोबा। नजर उठाकर देखा तो कमर के ऊपरी भाग में विठोबा मुकुट, माला धारण किए डोल रहे हैं । नीचे देखा तो शिवलिंग है। ऐसा दो बार हुआ। असंमजस बढ़ता ही गया, किंकर्तव्यविमूढ़ सी हो गई कि इन्हें क्या चढ़ाऊँ? मेरी ऊहापोह को भांपकर वे बोले – “पोरी, असा दुजाभाव करू नये. मी आणि हा एकच आहे. आमच्यात भेद नाही. मला बिल्वपत्र वाहिलं तरी चालेल आणि ह्यांना तुळशीपत्रं वाहिलं तरी चालेल. आम्ही एकच आहोत. माझी उंची तुला माहिती नाही. बघ, मी किती उंच आहे.”

ऐसा कहते-कहते ही उनका आकार बढ़कर छत के भी पार हो गया। वे कहने लगे – मेरा सिर आकाश में और चरण पाताल में हैं । मेरे चरणों पर कभी बिल्वपत्र या तुलसीपत्र नहीं चढ़ाना, ज्यादा से ज्यादा जल और पुष्प बस। मैं एक ही हूँ, शंकर भी मैं और विठ्ठल भी मैं, ये चरण, लिंग, मस्तक  सभी मेरे ही हैं, मैं ही ब्रह्माण्ड में व्याप्त हूँ । इतना कहकर वे अंतर्धान हो गये। वहाँ शिवलिंग ही पुन: दिखाई दिया। मैने शिवलिंग का अभिषेक किया, पत्र-पुष्प चढ़ाये। तभी मैने देखा कि उसमें से गंगा प्रकट हो रही है। मुझे फ़िर चरण, मस्तक आदि दिखाई दिए पर इस बार सूक्ष्माकार था । फ़िर शिवजी दिखे। उनके मस्तक से गंगाजी खळक रही थी । यकायक वे कुछ तिरछे हुए और गंगाधार मुझ पर गिरने लगी। सारा कक्ष जल से भर गया। यह सब ध्यान में ही चल रहा था । खूब गहरा ध्यान लगा।

काफ़ी देर हो गई तो पुष्पा काकी ने खोज-खबर ली। कक्ष में अंधेरा था। वे जैसे ही अंदर आई छपाक की ध्वनि हुई। ’ अरे बाप रे, सारा कमरा पानी से भरा है।’ ऐसा कहकर वे भागीं तो मेरा ध्यान टूटा। कितना मनभावन दर्शन हुआ था। नील वर्ण, जटाजूट, मुख से गंगा का प्रवाह। मेरा ध्यान टूटा तो शिवजी अदृश्य हो गये पर मेरे मुँह से गंगाजल प्रवाहित होने लगा। सभी ने उस जल को ग्रहण किया। शेष जल संग्रहीत कर लिया गया। कुछ समय में सब थम गया। मेरा सारा शरीर कम्पायमान था। कुछ सूझ नहीं रहा था। इतने में नागपुर वाले नारायण मामा आये। वे थे तो घर पर ही पर किसी कार्य से इस घटना के समय बाहर गये हुए थे। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि ध्यान में से उठने पर बा से गंगाजल का प्रसाद सभी ने लिया है और वे वंचित रह गये हैं तो बड़े पछताये। वे दो दिनों तक व्यंग्य में खते रहे-’हमें कौन प्रसाद देता होगा?’

दो दिन बाद की ही बात हैं, मैं साधना के लिए बैठने ही वाली थी कि वे भी सामने आकर बैठ गये। उसी समय मेरे पेट में अजीब सी गुदगुदी होने लगी, मुँह भी भर सा गया था । एकाएक मेरे मुँह से गंगाजल की धारा फ़ूट पड़ी जिसका प्रसाद उन्हें भी  मिल गया।………………..राजयोगी प्रभु बा |

Shivapravah July 2009

 

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5 responses to “जो पाता है, वो छुपाता है

  1. smita amit hardikar

    अक्टूबर 8, 2013 at 11:18 अपराह्न

    AnubhAv wachun thak whayla hot.

     
  2. स्वागता

    जुलाई 12, 2011 at 9:28 अपराह्न

    सर, आपले अनुभव देखील वाचायला मिळतील तर खूप आवडेल आम्हाला !

     
  3. Prof Prakash Khadilkar

    जुलाई 12, 2011 at 12:56 अपराह्न

    माझा तर विश्वास बसत नाही. पण हा आध्यात्मिक अनुभव आहे.ह्या अनुभवाचा अर्थ लावणे सोपे आहे.गुरु माउली तू एकच आहे. तुझ्या मुखातून गंगाप्रवाह रुपी प्रसाद आम्हाला चाखायला मिळणे तो ही आषाढी एकादशीच्या सोमवारी हा काही निव्वळ योगायोग नव्हे. मला पामराला परमपूज्य गुळवणी महाराजांची आठवण यावी आणी google realtime search engine ने मला ह्या पोस्ट वर पाठवावे, हा टेक्नोलाजी चा चमत्कार आहे.

     
  4. dheerajsinghthakur

    जुलाई 11, 2011 at 9:47 अपराह्न

    guru tum antaryami, hum sewak tum swami……. guru tum antaryami

     
  5. Ajay

    जुलाई 11, 2011 at 3:37 अपराह्न

    aap mahan hai baa, jai shri krishna

     

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