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गुरुपौर्णिमा पर संदेश

14 जुलाई

श्री गुरुपौर्णिमा पर सभी को आशीर्वाद । अपनी महान गुरु परम्परा और सद्गुरु योगीराज गुळवणी महाराज से यही विनती है कि मेरे प्रिय साधकों को वे नियमित साधना हेतु प्रेरित करें व साधनपथ के पथिक के रूप में उन्हें अपने लक्ष्य तक अतिशीघ्र पहुंचाएं ।

सद्गुरु ने हमारी राह को फ़ूलों की पंखुड़ियों से सजाया है पर हम कांटो की राह पर चल पड़ते हैं, वे हमें सन्मार्ग का संकेत करते हर मोड़ पर मिलते हैं पर हम भटकने के आदी हो गए हैं । यह ठीक है कि सद्गुरु ही करुणा करके हमें पुन: सही मार्ग पर ले आते हैं पर इस अवधि में हुई पीड़ा और समय की हानि को तो हमें ही भुगतना होता है । हम दु:खी होते हैं तो परोक्ष रूप से सद्गुरु को भी दु:खी करते हैं क्योंकि वे हमारे दु:ख में पीड़ा का अनुभव करते हैं तथा सुख में आनंदित अनुभव करते हैं ।

दीक्षा के पश्चात् सद्गुरु शिष्य के शरीर में सूक्ष्म रूप से प्रविष्ट हो जाते हैं । सही अर्थों में साधक सद्गुरु का ही अंश होता है। साधक को सद्गुरु के संकेतों को समझते हुए स्वयं उनमें समा जाना व पूर्णत्व प्राप्त करना होता है। इस यात्रा में मन मुख्य आधार होता है । सद्गुरु को साधक के तन की नहीं मन की दरकार होती है। प्रतिपल साधक का मन सद्गुरु पर केन्द्रित हो तो उनसे व उनके आश्रम से दूरी भी बाधक नहीं होती। वह हरपल सद्गुरु के ही पास होता है। इसके विपरीत कोई उनके सम्मुख या सान्निध्य में भी रहे पर मन उसका भटकता हो तो उसका उपस्थित होना निरर्थक ही होगा।

गुरुसेवा अनमोल है । यह प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष दोनों ही प्रकार से संभव है, दोनों का समान ही महत्त्व है। यों तो साधक ने सबकुछ गुरुकृपा से ही पाया है अत: उनके लिए सर्वस्व समर्पण का उदात्त भाव होना कोई त्याग नहीं है। साधक द्वारा निष्काम, नि:स्वार्थ व निरंहकारी साधना ही सच्ची गुरु सेवा है। साधक के मन मेम यह बात पक्की होनी चाहिए कि वह अपने सद्गुरु का प्रतिबिम्ब है। यदि वह कटु, भीरु, विषम, असत्य, प्रेमरहित, विवेकहीन व्यवहार करता या अपने स्वभाव से ईर्ष्या , द्वेष, राग, आलस्य आदि की झलक प्रस्तुत करता है तो वह अपने सद्गुरु के बिम्ब को धुंधला ही करता है ।

साधक को बाहरी व भीतरी दोनों प्रकार की शुद्धता पर ध्यान देना आवश्यक है। बाहरी शुद्धता का अर्थ वस्त्र – आभूषण से या अन्य भौतिक उपकरणों से की गई शारीरिक सजावट नहीं है। सद्गुरु के बताए साधन और तप के तेज से ही ये दोनों श्रेष्ट शुचिताएं संभव है। साधक की हर सांस में गुरुमंत्र प्रतिष्ठित हो तथा हर समय निरंतर जाप चलता रहे तो साधन और तप को फ़लित होने में कोई देरी नहीं लगती है।

यह सब करना कोई कठिन काम नहीं है। साधनपथ में लगना कोई चट्टानें तोड़ना, हिमालय पर चढ़ाई करना या खून-पसीना एक करना नहीं है। बस मन को इसमें लगाना है । सारा खेल मन पर नियंत्रण का है। परमात्मा के बनाए इस संसार में अपने सांसारिक दायित्वों को पूर्ण करते हुए ही ईश्वरत्व को पाना है अत: इसके किए मन को वश में करना ही एकमेव उपाय है। यह ध्यान रहे कि हमें मुमुक्षु, साधक और साध्य तक की यात्रा इसी शरीर से इसी जन्म में पूर्ण करनी है। इसके किए कुछ भी छोड़ना नहीं है। केवल ’न दैन्यं न पलायनं’ की उक्ति को जीवन में धारण कर लेना है।

उधार का पुस्तकीय ज्ञान बटोरना, व्यर्थ के तर्कों के भँवर में फ़ँसना , निरर्थक शंकाओं – आशंकाओं में डूबना-उतराना, अधकचरी व बिना अनुभूत बातों को बांटते रहना बेतुका है। अंधे बनकर अंधविश्वास व निरंधों पर विश्वास करने से बेहतर है अपनी भीतरी चक्षुओं को पहचानना, उन्हें चैतन्य करना। इसमें ध्यान हमारा आधार बनेगा। ध्यानावस्था में जो भी चिंतन, मनन और मंथन होगा वह आत्मज्ञान बन जाएगा। वही अमृत तत्त्व बन जाएगा। ध्यान करने से दुर्लभतम बातें सहज मिल जाती हैं। ध्यानी को कुछ भी याचना नहीं करनी पड़ती, उसकी याचकवृत्ति ही समाप्त हो जाती है।

कई बार व्यक्ति ध्यान करने की सोचता तो है पर शर्तों के साथ। जैसे मेरा अमुक कार्य सध जए तब मैं ध्यान करने लगूंगा, यह मिल जाए तो फ़िर ध्यान में ही मन रमा लूंगा आदि-आदि। पर सच मानना न तो इससे कुछ मिलेगा और न ही ध्यान सधेगा। यह दुविधा की स्थिति है। ’दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम।’ ध्यान सबसे अंत में नहीं सबसे पहले करने की आवश्यकता है। ध्यान को टालने के बहाने नहीं ढूंढना है वरन् ध्यान करने के अवसर ढूंढ़ना है। सद्गुरु के कहने से ध्यान करना अनिवार्य है इस भाव से उन पर अहसान के लिए ध्यान नहीं करना बल्कि अपने कल्याण के भाव से ध्यान करना है।

ध्यान में साधक को तो बस आसन लगाकर बैठना भर है। आँखे बंद करके अपने भीतर की ओर चलना है। हमारे भीतर जाग्रत कुंडलिनी शक्ति बिराजमान है, वह सर्वशक्तिमान जगदम्बा ही सबकुछ करवा लेगी, बल्कि वही सब कर देगी। आपको तो कुछ भी नहीं करना है। अपने आपको निष्क्रिय कर देना है। वैसे भी जीवन भर कुछ न कुछ करने की होड़ और दौड़ में ही तो लगे रहे हो। क्या पा लिया? अब भागना छोड़कर शांत चित्त से बस द्रष्टा बन जाओ। बाहर की यात्रा बहुत हो गई, भीतर की शुरुआत करो। एक मूल को पकड़ो, दर-दर भटककर ठोंकरें मत खाओ। समय कम है और कीमती है, उसे बरबाद मत करो।

गुरुपौर्णिमा के पर्व से एक नई प्रथा व परम्परा की पहल करो। नम मन से मन का करो, समर्पण चित्त का करो, आरती, धूप, दीप के बजाय स्वयं पावन बनो, किसी वस्तु की भेंट के बजाय अपना मन, अपना दिल सद्गुरु को भेंट करो। इससे पवित्र पूजा और भेंट इस जगत में और कोई नहीं है। स्वयं को कभी भी सद्गुरु से दूर या भिन्न कभी भी मत समझो। सगुरु तो आपके अंतस में ही निवास करते हैं और आपके चेहरें में ही वे अपने आपको देखते हैं। इसलिए हरक्षण खुश रहो, आनंद में डोलते रहो, हँसो और हँसाओ।

एक महत्त्वपूर्ण बात की ओर सभी का ध्यान दिलाना चाहूंगी। गुरु भाइयों और बहनों को परस्पर स्नेह से रहना चाहिए। मेरा पूरा वासुदेव कुटुम्ब प्रेम के धागे से बंधा हुआ है। साधकों का एक दूसरे के प्रति आत्मीय भाव, विश्वास और बंधुत्व ही दुर्लभ पूंजी है। एक दूसरे का सम्मान होना चाहिए। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, बुद्धिमान-कमबुद्धि जैसे भेदों का इस कुटुम्ब में कोई अस्तित्त्व नहीं है। एक साधक को पीड़ा हो तो दूसरों को भी उतना ही दर्द हो। किसी एक पर संकट हो तो सभी उसके निवारण को दौड़ पड़े यही वासुदेव कुटुम्ब का भाव है। साधकों का आपसी रोष मुझे असहनीय पीड़ा देता है। गुरु बंधु का नाता संसार का सबसे पावन रिश्ता है। बाकी सभी रिश्ते स्वार्थ पर आधारित होते हैं पर यह नाता नि:स्वार्थ है।

आश्रम में सभी का प्रवेश अलग-अलग अवधि में हुआ है । सभी अलग- अलग दिशाओं और मानसिकताऒं से आए हैं किन्तु यहां प्रविष्ट होते ही सभी एक हो गए हैं। एकाकार हो गए हैं । तन विलग हैं पर मन सभी के एकसार हैं। यहां से जाने पर यही एकरसता बनी रहे इसीलिए सद्गुरु ने हमारे संस्थान को ’एकता ध्यान योग’ नाम दिया है। इस नाम का सार्थक करना भी सद्गुरु आज्ञा का अनुवर्तन ही है।

—–तुम्हारी अपनी ही ’बा’

शिवप्रवाह जुलै 2008                                        

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1 टिप्पणी

Posted by on जुलाई 14, 2011 in नवीन

 

One response to “गुरुपौर्णिमा पर संदेश

  1. प्रकाश सर

    जुलाई 14, 2011 at 9:21 पूर्वाह्न

    “एकता ध्यान योग” यह केवल नाम है क्या?

    आइये इस गुरुस्मरण दिन पर हम सब लोग हमारे नाम पर कुछ विचार करे।
    इस नाम का एक महत्त्वपूर्ण भाग है “योग”, जिसे सुनते ही हमे हमारी चित्तवृत्ती के निरोध की बात याद आती है।”बस मन को इसमे लगाना है”
    इस योग मार्ग को ध्यान योग क्यो कहा जाता है? क्योंकि इसमे सबसे पहले, बीचमे और अन्ततक ध्यान ही लगाना होता है।
    ध्यान का अर्थ है गुरुवाणी को सुनना.अन्तःकर्णसे गुरुवचनों को सुनना.
    एकता हमे एकरसता बनाये रखने की सीख देती है। इस आधार को बनाये रखना, सबके कल्याण का विचार करना, क्योंकि इसी मे मेरा कल्याण है याद रहे इसीलिये हमे नाम मिला है|

     

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