RSS

प्रकट पादुका

14 जुलाई

॥ प्रकट पादुका ॥

मुझे आज भी वह स्वर्णिम दिन याद है । सन 1978 के दशहरे का अगला दिन था । गुरुवार व एकादशी का संयोग । सुबह 2.45 बजे हमारे गिरगांव वाले घर में चंदन की महक गमकने लगी । लकड़ी की किसी वस्तु के जमीन पर गिरने की भी आवाज आई । इससे मेरे देवर कै. शशिकाका की नींद खुल गई । उन्होंने सोचा कि चौकीदार गोरखा होगा और वे करवट बदलकर फ़िर सो गए । अभी सोये भी नहीं थे कि कोई खड़ाऊ पहनकर चल रहा है ऐसा लगा । उन्होंने आवाज की दिशा में आँखे गड़ाई तो एक धुंधली सी आकृति दिखी । वे डर गए । घरवालों को जगाया। सभी ने बत्ती जलाकर इधर-उधर देखा पर कुछ भी नहीं पाया तो सभी वापस सो गए ।

कुछ ही देर बीती कि बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। सभी पुन: उठकर पूजाकक्ष की ओर भागे चले आए । मेरे दूसरे देवर गोपी काका ने मेरे कक्ष का दरवाजा खटखटाया। भाऊ साहब ने उन्हें टोका और कहा कि बा की समाधि भंग मत करो, थोड़ी देर में सब ठीक हो जाएगा।

उस समय मैं ध्यान में थी । मुझे ध्यान में ही प. पू. सद्गुरु गुळवणीजी महाराज की वाणी सुनाई दी। उसका भावार्थ था- मैंने मेरी नहीं बल्कि मेरे गुरुवर प. पू. टेंबे स्वामी महाराज की पादुकाएं भेजी हैं । वे अत्यंत कर्मठ एवं कर्मकाण्डी थे । जो भी साधक उनके बताए नियमों का पालन करेगा उस पर गुरुदेव की पूर्ण कृपा बरसेगी।

इधर घर में हो रही अफ़रातफ़री से मेरा ध्यान टूट गया। मुझे लगा कि हमेशा की तरह या तो कुमकुम के या पुष्प के पगले प्रकट हुए होंगे। मैं भी पूजा कक्ष की ओर बढ़ी । पूजा कक्ष में अद्भुत दृश्य था। वहां जिस लकड़ी के संदूक पर पूज्य गुरुदेव की तस्वीर रखी हुई थी उसके सामने चंदन के दो खड़ाऊ साक्षात् प्रकट होकर बिराजित थे । दायां खड़ाऊ बायें से एक इंच आगे खुला हुआ था । दोनों पर एक- एक मोगरे का पुष्प चढ़ाया हुआ था । इन प्रत्यक्ष पादुकाओं का दर्शन कर सम्पूर्ण शरीर में आनंद की अलौकिक लहर दौड़ गई। कभी हँसने की तो कभी रोने की इच्छा हो रही थी । पूरे शरीर में कंप सा छा गया। रोमांच के कारण उदर में गोला आ गया, जी घबराने लगा और लगातार पसीना छूट रहा था। मैंने किसी तरह अपने आपको संभाला। प्रात: स्नान के बाद सभी पुन: पूजा कक्ष में एकत्र हुए । काकड़ आरती (मंगला) के साथ पादुकाओं पर दूध का अभिषेक किया गया, पुष्प चढ़ाकर उनकी पूजा- अर्चना की गई।

उस दिन मुझे अत्यंत खुशी भी हो रही थी और दु:ख भी। खुशी इस बात की थी कि परमपूज्य गुरुदेव ने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर ली थी । मैंने प्रार्थना इसलिए की थी क्योंकि गुरुकृपा से मेरे साधनाकाल मेम अनेक छोटे-बड़े चमत्कार घटित होते रहते थे। जैसे कुमकुम के पगले, पुष्पों से सीढ़ियां भर जाना, रुद्राक्ष प्रकट होना आदि। इन चमत्कारों से अनेक प्रकार की चर्चाएं होने लगी थी। लोग अजीब प्रकार से मुझे देखते थे, कईं प्रकार की बातें होती थीं। मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता था। जब अति होने लगी तो मैंने पूज्य गुरुदेव से प्रार्थना की। कहा- आप तो स्वयं चमत्कारों को पसंद नहीं करते थे फ़िर मेरे साथ ये क्यों? मुझे प्रसिद्धि नहीं चाहिए, मैं तो बस आपका नाम लेती रहूं । यदि आप मुझे कुछ प्रदान करने योग्य समझें तो ऐसी वस्तु दें जिसके समक्ष प्रार्थना करने पर हर साधक की कामन पूर्ण हो, आउर पादुकाऒं के प्रकटीकरण से वह प्रार्थना पूर्ण हुई । दु:ख इस बात का था कि लोकापवाद के भय से मैंने अपने गुरुदेव को कष्ट दिया और उन्हें मेरे लिए कुछ पूर्ति करनी पड़ी । लेकिन तभी मेरे मस्तिष्क में विचार आया कि मैंने अपने लिए तो कुछ मांगा नहीं और जो सद्गुरुदेव ने दिया है वह सर्वमंगल के लिए है । साधकों के कल्याण के लिए है। मुझे इस विचार से संतोष हो गया।

ये पादुकाएं साक्षात् हैं इसका प्रमाण कुछ ही दिनों में मिल गया। महाशिवरात्रि का पर्व था। मैं शिवपूजा की तैयारी में लगी थी । मुळे ताई नाम साधिका भी वहाँ बैठी थी । वे बोलीं– बा आप पूजा की तैयारी करो, मैं इन पादुकाओं को स्नान कराकर चंदन का लेप कर देती हूँ । वे एक नरम कपड़ा लेकर पादुकाएं पोंछने लगीं ।काफ़ी तसल्ली और मनोयोग से वे पुराने लगे हुए चंदन को साफ़ कर  रही थीं ताकि नये चंदन का लेप किया जा सके। अचानक ही उन्होंने पाया कि पादुकाओं में से लाल द्रव बहने लगा।

पहले तो उन्हें लगा कि कुमकुम होगा, तो उन्होंने कपड़े से हल्के हाथ से पोंछ लिया। कपड़ा हटाने पर द्रव फ़िर बह निकला। वे फ़िर पोछने लगी पर अब तो बहाव थम ही नहीं रहा था। ध्यान से देखने पर लगा कि यह कोई द्रव नहीं बल्कि रक्त है । घबराकर उन्होंने मुझे सारी घटना बताई औ दु:खी होकर वे रोने लगीं । मैंने भी वह सब देखा। मैंने घबराए बिना दोनों पादुकाओं पर श्रद्धापूर्वक ठण्डे दूध का अभिषेक किया तो धीरे- धीरे रक्त का बहाव कम होकर थम गया।

सभी के दर्शनार्थ व कल्याणार्थ आज वे ही पादुकाएं शिवपुरी आश्रम में पूज्य गुरुदेव की प्रतिमा के सामने स्थापित हैं । उन पर चांदी का पर्ण चढ़ा दिया गया है। प्रतिदिन अनेक साधक उनके सामने अपना मनोभाव निवेदन करते हैं। सद्गुरु का दिया हुआ यह एक अलौकिक प्रसाद है।………राजयोगी प्रभु बा

(बा द्वारा उद्धाटित अनुभव का लिपि रूप ) पूर्वप्रसिद्धी – शिवप्रवाह जुलाई 08

back to Guruvanee

back to अमृतानुभव

Advertisements
 

टैग:

3 responses to “प्रकट पादुका

  1. smita amit hardikar

    अक्टूबर 8, 2013 at 11:26 अपराह्न

    Paduka ke darshan karke dhanya ho gaye ham.

     
  2. dheerajsinghthakur

    जुलाई 22, 2011 at 10:37 अपराह्न

    sadguru tere charno ki gar dhool mil jo mil jaye…………..

     
  3. प्रकाश सर

    जुलाई 14, 2011 at 7:28 पूर्वाह्न

    क्या उपरोक्त अनुभव को नकारा जा सकता है?
    पगलिये, पुष्प और पादुकायें तस्बीरों मे स्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर है। ये प्रत्यक्ष प्रमाण है। जिन साधकों के मन में संदेह हो वे शिवपुरी आश्रम मे महाराज के प्रतिमा का दर्शन कर इस सत्य को वेरिफाय कर सकते है।
    क्या महाराज चाहते थे कि वे अपनी पादुकाओं की पूजा करवायें?
    यहा पर महाराज का यह वचन विचारणीय है; “मैंने मेरी नहीं बल्कि मेरे गुरुवर प. पू. टेंबे स्वामी महाराज की पादुकाएं भेजी हैं ”

    विज्ञान हो या अध्यात्म,साधक का श्रद्धावान होना अत्यंत जरूरी है। क्योकि किसी ने किसी को ठीक ही कहा था, “श्रद्धावान को ही ज्ञान की प्राप्ति होती है”

     

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: