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हृदय तुम्हारा बहता जल है ।…व. राव.

16 जुलाई

एक सरल रेखा हो तुम तो

हृदय तुम्हारा बहता जल है ।

कल- कल रेवा के प्रवाह सा,

गहरा किन्तु दिखता तल है ।

हम हैं बादल – आसमान तुम,

हम निष्प्रभ है- भासमान तुम ।

आंचल में हैं स्नेह – तरंगें,

हम सब की हो माँ समान तुम ।

तुम तारक हो सगरसुतों की

फ़िर भी तुम थिर- हम चंचल है ।

एक सरल रेखा हो तुम तो,

हृदय तुम्हारा बहता जल है । ।

तुम भारी हो जैसे धरती,

हलकी जैसे हवा हो तिरती ।

आशीर्वाद लुटाती मुद्रा,

हर आतुर का संकट हरती।

कई हनुमान तुम्हारे प्रेरे,

तुम में तो राघव का बल हैं।

एक सरल रेखा हो तुम तो,

हृदय तुम्हारा बहता जल है । ।

तुम्हें छुए या छलता जाए,

जुड़ जाए या टलता जाए।

निर्विकार तुम अनासक्त हो,

हर हालत वह पलता जाए ।

बीज भले कोई कड़वे बोए,

तुमसे पाता मीठा फ़ल है।

एक सरल रेखा हो तुम तो,

हृदय तुम्हारा बहता जल है । ।

वरदीचन्द राव द्वारा विरचित कविता

शिवप्रवाह अप्रैल 2010

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3 टिप्पणियाँ

Posted by on जुलाई 16, 2011 in नवीन

 

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3 responses to “हृदय तुम्हारा बहता जल है ।…व. राव.

  1. dheerajsinghthakur

    जुलाई 24, 2011 at 3:52 अपराह्न

    Sachcha Darbaar hai ye,sir jhukane chale aao ,mere guru ka darbar hai ye sir jhukane chale aao Samast Vasudev Kutumb par baa ki kripa bani rahe………………………………………

     
  2. Shivram Sawant Yogesh

    जुलाई 16, 2011 at 10:40 अपराह्न

    बहुत बङा सच बताया है सर आपने….
    जय श्री क्रिष्ना…..

     
  3. प्रकाश सर

    जुलाई 16, 2011 at 9:24 पूर्वाह्न

    कुतस्त्वा कश्मलं इदं विषमे समुपस्थितम्।अनार्यजुष्टम् अस्वर्ग्यम् अकीर्तिकरम् अर्जुन॥
    गुरु की स्तुति-गान करते हुये मुझे यह नही नही भूलना चाहिये कि आज महाराज ने किस ड्यूटी पर लगाया है। बा से प्रार्थना है कि वे मेरे कर्तव्य कर्म पूरे करने के लिये आज शक्ति दे।

     

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