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गुरु तुम अंतर्यामी | व. राव.

20 जुलाई

गुरु अंतर्यामी होते हैं | इस बात को हम सभी अनेक बार दुहराते रहते हैं| फिर भी अपने मन में क्या चल रहा है, इसकी जानकारी सद्गुरुदेव को देने जी ललक सामान्यत: देखी जाती है| अपनी किसी सफलता पर प्रसन्नता बांटना, विफलता पर विषाद को बांटना एक अच्छी बात हो सकती है, पर हम किसे बांट रहे हैं? नानी के आगे ननिहाल की बात करना या दाई के आगे पेट की दशा बताना कितना ठीक है? यह भी तो सोचें| हो सकता है की जब हम अपनी समस्याओं का उदघाटन सद्गुरु के समक्ष कर रहे होते हैं तो उसी समय वे हमारी या हम जैसे किसी अन्य साधक की समस्या का समाधान करने में जुटे हों | ऐसे समय में उस अनुष्ठान को व्यवधानित करना ठीक रहेगा क्या? हमारे मन में तर्क होता है कि हम जब तक अपनी समस्या सदगुरुदेव को बतायेंगे ही नहीं तब तक उन्हें जानकारी कैसे होगी? समाधान कहाँ से आएगा? अपने सद्गुरु की सामर्थ्य पर यह कैसा विशवास? हमें उन्होनें अपने पास बुलाया, अपने स्वरूप का दर्शन कराया, अपने मार्ग का सहयात्री बनाया तब तो हमारा विशवास गहराता गया और जैसे ही कोई संकट आया तो हम उतावले हो उठे| ऐसा लगता है कि स्वमूल्यांकन की आवश्यकता है |

ऐसा नहीं है कि सद्गुरुदेव से समस्या का , संकट का जिक्र करना कोई धृष्टता है| यह अपनापन ही है, यह समर्पण का एक दिखता हुआ प्रमाण ही है, यह समस्या के समाधान के लिए अंतिम उपाय का द्योतक ही है, परन्तु हम अपने सदगुरुदेव की कृपा पद्धति से भी अनजान न बनें | मुझे लगता है कि परमहंस प्रभु बा के जीवन का अधिकांश समय अपने साधकों की सम्पूर्ण योग क्षेम की चिंता व व्यवस्था में ही गुजरता है| हमारे आसपास मंडराती समस्या जब तक हम पर प्रभाव डाले तब तक प्रभु बा उपाय भी प्रारंभ कर चुके होते हैं|  हम व्यथित होकर जब उनके समक्ष अपनी पीड़ा व्यक्त  कर रहे होते हैं, तब तक वे उपाय के सन्निकट होते हैं और हम अज्ञाननतावश अपनी बात ‘अ’ से शुरू कर रहे होते हैं|

सच तो यह है कि हमें अपनी समस्याएं उन्हें विस्तार से तभी बताने की आवश्यकता होती है, जब वे हमें पूछें| क्योंकि जब तक वे हमारी सामर्थ्य पर विश्वास करते होते हैं तब तक हमारा संघर्ष जारी रहता है और जब सफलता के सूत्र दिखने लगते हैं तब समझना चाहिए कि मसला सदगुरुदेव ने अपने हाथ में ले लिया है| हो सकता है कि साधक में सामर्थ्य भरने के उद्देश्य पूर्ण करने के दौरान हमें संकट बढ़ता हुआ भी दिखाई दे किन्तु जब सद्गुरुरुपी रामबाण हमारे पास है तो अंतिम परिणाम के प्रति संशय क्यों?

सद्गुरु को मात्र शरीर नहीं हैं | वे अनुग्रह देते ही तत्त्वरूप से प्रत्येक साधक में प्रतिष्ठापित हो जाते हैं| हमारी दुनियादारी लाभ-हानि के भंवर में उस दिव्यता की अनुभूति भले ही न कर पाए पर वे हैं तो बिराजमान| हम प्रत्यक्ष कुछ कहें या अप्रत्यक्ष सभी सन्देश जातो तो वहीं है| हमें तो बस विश्वास -सुमन चढ़ाना व सुगंध का आनंद लेना है|………………….वरदीचंद राव.

पूर्वप्रसिद्धी शिवप्रवाह मे जून २०११.

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