RSS

जल में कुंभ, कुंभ में जल है|

26 जुलाई

वर्षा में बदलियां पानी बरसाती है। भू-तल को स्नेहसिक्त कर देती हैं । उस जल से गढ्ढे तो स्वीकारोक्ति भाव के कारण परिपूरित हो जाते हैं पर टीले अहंकार के उठाव के कारण जलवांचित रह जाते हैं । तुम भी गढ्ढों की तरह बनों टीलों की तरह नहीं। अपने आपको भरो, रीता मत रखो। जगत् में प्रभुकृपा की वर्षा तो प्रतिक्षण हो रही है।

मैं कई लोगों को देखती हूँ, तो उन पर मुझे दया आती है। इतने बेमतलब के भावों से भरे हैं कि उन्हें किंचित भी अवकाश नहीं है अपने भीतर शिवभाव को भरने का। उनके मानस में जरा सा भी शून्य नहीं, सुथरा आकाश नहीं। जिसमें आकाश नहीं वह मुक्ति के लिए कैसे कुछ कर पायेगा? जैसे जलवर्षण के लिए बाह्य आकाश आवश्यक है, बादलों का बनना, घुमड़ना, उमस होना आवश्यक है वैसे ही शिवकृपा की वृष्टि के लिए भीतरी आकाश एवं बाह्य आकाश की तरह परिवर्तन की ललक जरूरी है। भीतर और बाहर के आकाश का एकाकार होना ही मुक्ति का प्रबोधन है, वही ईश्वरानुभव है।               ……आपकी अपनी बा.

पूर्वप्रसिद्धी शिवप्रवाह २००७.

back to सद्गुरुसंदेश

back to Guruvanee                                                     back to Home Page

Advertisements
 

टैग:

2 responses to “जल में कुंभ, कुंभ में जल है|

  1. mrunalini chikte

    मार्च 14, 2013 at 6:53 अपराह्न

    pranam Baa, pl. bless me &my family

     
  2. ekmitra

    जुलाई 26, 2011 at 6:01 अपराह्न

    गंगा हमारी बा है और पिता हिमालय!

     

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: