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मन मंदिर में उज्ज्वल हो तेरा निर्मल ज्ञान

02 अगस्त

सुना है कि परमात्मा ने ढाई दिन में सम्पूर्ण सृष्टि की  संरचना की। अंत में अपने कौशल प्रगट करने के लिए उन्होंने मोर जैसा सुन्दर प्राणी सृजित किया। इस मोर को बनाने में भी परमात्मा को ढाई दिन लग गए। मोर सतरंगी और स्वर्णाभा से परिपूर्ण था। सृष्टि की सुन्दरतम रचना हो गया मोर । ईश्वर के इस चमत्कार को देखकर सभी दंग रह गए। चारों ओर मोर के सौन्दर्य की चर्चा होने लगी।

इसका परिणाम यह हुआ कि मोर को अपनी सुन्दरता पर घमण्ड हो उठा। वह परमात्मा के अनुग्रह को भूलकर अपनी सुन्दरता को स्वयंसिद्ध पराक्रम मान बैठा और गर्वोक्तियां करने लगा।  वह अन्य प्राणियों का उपहास करने को भी उद्यत होने लगा। बात परमात्मा तक पहुँची । वे अपनी श्रेष्ठतम कृति को लुप्त नहीं करना चाहते थे पर गर्व तो चूर करना ही था। कहते हैं कि ईश्वर ने मोर के सौन्दर्य को तो यथावत् रखा किन्तु पाँवों को कुरुप बना दिया। इसलिए आज भी मोर जब नाच कूद कर अपने पैरों को देखता है तो वह शर्मिन्दगी का अनुभव करता है तथा अपने घमण्ड को वह स्मरण कर मन ही मन रोता, घुटता है।

अज्ञानतावश कभी कभी ईश्वरीय अंश से उपजात मनुष्य भी अभिमान डूब जाता है। अभिमान करके हम ईश्वरीय अनुकम्पा से अपने आपको पृथक् कर देते हैं। परमात्मा को अभिमान सुहाता ही नहीं है। उसके प्रति अहोभाव की उपासना हो, धन्यता के शब्दों की प्रार्थना हो, समर्पण के संस्कारों की पुष्पमाला हो तो उसकी अँगुली हमारे हाथ में ही समझो ।                 ….आपकी अपनी बा


पूर्वप्रसिद्धी शिवसुगंध २००७.

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2 टिप्पणियाँ

Posted by on अगस्त 2, 2011 in नवीन

 

2 responses to “मन मंदिर में उज्ज्वल हो तेरा निर्मल ज्ञान

  1. abhinav

    अगस्त 2, 2011 at 10:44 पूर्वाह्न

    ye mor to bada ghamandi nikla.

     
  2. प्रकाश सर

    अगस्त 2, 2011 at 8:20 पूर्वाह्न

    satyam, Shivam, Sundaram.
    This means Truth, Useful, Beautiful.

     

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