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गहरा गहरा ध्यान करो|

03 अगस्त

सद्गुरु की सीख

आत्मीय साधक! ध्यान करते-करते तुम लम्बी यात्रा कर चुके हो, कुछ सीख बातें अब तुम्हें बतानी हैं। ध्याता, ध्यान, ध्येय और ध्यान प्रयोजन-इन चारों को जानकर ध्यान करना ही उसका फ़लप्रदाता है। जो ज्ञान व वैराग्य से उत्पन्न हो, सदा शांतचित्त रहता हो, श्रद्धालु हो और जिसकी बुद्धि प्रसाद गुण से युक्त हो, ऐसे साधक को ही सत्पुरुषों ने ध्याता कहा है। श्रद्धापूर्वक, विक्षेपरहित चित्त से परमेश्वर का चिन्तन ही ध्यान है। बुद्धि के प्रवाहरूप ध्यान का जो आलम्बन या आश्रय है, उसी को ध्येय कहते हैं। मोक्ष सुख का पूर्ण अनुभव और अणिमा आदि ऐश्वर्य की उपलब्धि ध्यान के प्रयोजन हैं। ध्यान से सौख्य और मोक्ष दोनों की सहज प्राप्ति होती है अत: मनुष्य को सबकुछ छोड़कर ध्यान में लग जाना चाहिए। बिना ध्यान के ज्ञान नहीं होता और जिसने योग का साधन नहीं किया है, उसका ध्यान सिद्ध नहीं होता। जिसे ध्यान और ज्ञान दोनों प्राप्त हैं, उसने समझो भवसागर को पार कर लिया है। शिवपुराण में आया है—

यथा वह्निर्महादीप्त: शुष्कमार्द्रं च निर्दहेत् ।
तथा शुभाशुभं कर्म ध्यानाग्निर्दहते क्षणात् ॥
ध्यायत: क्षणमात्रं  वा श्रद्धया परमेश्वरम् ।
यद्भवेत् सुमहच्छ्रेयस्तस्यान्तो नैव विद्यते ॥

जैसे प्रज्ज्वलित हुई आग सूखी और गीली लकड़ियों को जला देता है, उसी प्रकार ध्यानाग्नि शुभ और अशुभ कर्म को क्षणभर में दग्ध कर देती है। जैसे छोटा दीपक भी गहन अंधकार का विनाश कर देता है, इसी तरह थोड़ा सा योगाभ्यास भी भारी पाप का विनाश कर डालता है। श्रद्धापूर्वक क्षणभर भी परमेश्वर का ध्यान करने वाले पुरुष को जो महान् श्रेय प्राप्त होता है, उसका कहीं अंत नहीं है। शिवपुराण में ही कहा गया है-

नास्ति ध्यानसमं तीर्थं, नास्ति ध्यानसमं तप: ।
नास्ति ध्यानरूपो यज्ञस्तमाध्यानं समाचरेत्त् ॥

ध्यान के समान कोई तीर्थ नहीं है, कोई तप नहीं है और कोई यज्ञ नहीं है, इसलिए अवश्य ध्यान करें।

प्राणायाम करने से शांति, प्रशांति, दीप्ति और प्रसाद जैसी दिव्य शक्तियां प्राप्त होती हैं। समस्त आपदाओं के शमन को शांति कहते हैं, तम ( अज्ञान) का अंतर्बाह्य नाश प्रशांति कहलाता है, अंतर्बाह्य ज्ञान के प्रकाश को दीप्ति और बुद्धि की जो स्वस्थता (आत्मनिष्ठता) है, उसे प्रसाद कहा गया है। बाह्य और् आभ्यंतरसहित जो समस्त करण हैं, वे बुद्धि के प्रसाद से शीघ्र ही प्रसन्न और निर्मल होते जाते हैं। ध्यानी साधक आत्मतीर्थ में अवगाहन करते और आत्मदेव के भजन में ही लगे रहते हैं। इसे योगियों को ईश्वर के सूक्ष्म स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन होता है इसलिए प्यारों, मैं निरंतर कहती हूँ, ध्यान करो, भाई ध्यान करो। गहरा गहरा ध्यान करो। परमशिव को प्राप्त करो।                ……………..राजयोगी प्रभु बा

शिवप्रवाह अगस्त 2007.

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One response to “गहरा गहरा ध्यान करो|

  1. ekmitra

    अगस्त 3, 2011 at 9:13 पूर्वाह्न

    मैने पितांबरी के चित्र पर जिसमे महाराज उनके पीछे बैठकर कह रहे थे कि बेटा, डरो मत, मै तुम्हारी पीछे हूं, जब ध्यान कर रहा था तो मुझे जो मिला उसे share कर रहा हूं। महाराज ने कहा कि साथ साथ यह मंत्र भी जपो. इस मंत्र वही शक्ति है जो शिवोऽहम् मे है.
    मैने उनके कहने के अनुसार इस मंत्र का जप करते करते चित्र पर भी ध्यान किया
    मंत्र इस प्रकार है।
    प्रभूबा प्रभूबा प्रभूबा प्रभूबा
    प्रभूबा प्रभूबा प्रभूबा प्रभूबा ।
    प्रभूबा प्रभूबा प्रभूबा प्रभूबा
    प्रभूबा प्रभूबा प्रभूबा प्रभूबा ॥
    तुरंत ही मेरा गहरा ध्यान लग गया। भुजंगप्रयात इस वृत्त की एक लहर सी मेरे मन मे गुंजने लगी।
    बचपन मे याद की हूयी “मनाचे श्लोक” स्वामी रामदास कृती के कई श्लोक याद आने लगे। शंकराचार्य के कई स्तोत्र भी जिन्हे कभी का भूल चुका था, वे अभी भी मेरे स्मृति में है इसका मुझे तनिक भी पता न था।
    आश्चर्य तो तब हुआ जब यह फिल्मी गीत भी उसी प्रवाह मे याद आया.

    अकेले अकेले कहा जा रहे हो हमे साथ लेलो जहा जा रहे हो….

     

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