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“बा” का प्रसाद

07 अगस्त

अधिकतर लोग जब ध्यान करते हैं तो वे श्रद्धारहित होते हैं। न तो उनमें  अष्टसात्त्विक भावों का जागरण ही हो पाता है और न ही उनका ध्यान सध पाता है। हर कोई न जाने क्यों दिखावा करने को आतुर हो उठता है कि उसका ध्यान सबसे श्रेष्ठ लगा है, न जाने क्यों वह चमत्कार का वर्णन करने को उत्सुक दिखाई देता है? ऐसा दिखावटी व्यक्ति स्वयं भी फ़ँसता है तथा प्रभाववश अन्यों को भी भरमाता है। स्मरण रखें ध्यान एक सहज क्रिया है। ध्यान लगने में समय लगता है, आसन पर बैठे कि ध्यान लगा ऐसा कोई मण्डी का सौदा नहीं है यह क्रिया।

आप केवल ध्यान करें, दिखावा नहीं करना है। ध्यान के समय किसी मूर्ति भी आँखों के सामने मत लाओ, केवल बैठे रहो। उस असीम ईश्वर ई गरिमा का गुणानुवाद करो, उसका करिश्मा अनुभव करो। तुम्हें कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है। केवल श्रद्धापूर्वक ध्यान की गहराई में उतरते चले जाओ। उस परम प्यारे को केवल प्रेम चाहिए, एकाग्रता चाहिए, अपने मार्गद्रष्टा सद्गुरु का स्मरण चाहिए, आडम्बनविरहीन होकर अपनी यात्रा जारी रखिए, ईश्वर तो बस आपकी प्रतीक्षा में ही खड़ा है। तुम तो केवल सही ढंग से, सन्मार्ग  से आगे बढ़ो, मंजिल समीप ही है।             ………..आपकी अपनी बा!

पूर्वप्रसिद्धी–शिवसुगंध- फरवरी 2007

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