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समाधि और शाकंभरी पूजा

09 अगस्त

यह घटना भी हमारे गिरगांव के निवास के समय की ही है। हम जिस मकान में रहते थे, उसका नाम ’भगवान भुवन’ था। मेरे जीवन के अधिकांश अनुभव व चमत्कार उसी भवन से जुड़े हुए हैं। जैसे दिव्य-दर्शन होना, पादुका प्रकट होना, गुलाब व मोगरे के फ़ूल आना, तीन दिन और सात दिन की समाधि लगना आदि-आदि। इसीलिए मुझे वह भवन अतिप्रिय था। कालांतर में जब मकान जीर्ण-शीर्ण हो गया तो विवशतावश उसे भारी मन से छोड़ना पड़ा।

वहीं की बात है । जब मुझे तीन दिन की समाधि लगी तो वह खुली आँखों से ही लगी थी। मैं काष्ठवत हो गई। पलकों का हिलना, सांस का चलना बंद हो चुका था। इसी समय मुळे ताई हमारे घर आईं। जब मुझे समाधि अवस्था में देखा तो वे हैरत में पड़ गईं। फ़िर तो पूरे तीन दिन वे वहीं रहीं। मेरे समाधि से बाहर निकलने पर ही वे लौटीं। उस समाधि में मुझे भागवत पुराण की कई घटनाएं साक्षात् दिखीं। एक पीपल पेड़ पर भगवान कृष्ण शयन करते हुए दीखे, मनु महाराज और उनके वंशज अनेक ऋषि-मुनि भी दीखे। ब्रह्मा, विष्णु व महेश की उत्पत्ति, महादेव और उनसे सात आकाश ऊपर बैठी महामाया तथा उनके संग रहने वाली ६४ जोगनियां भी समाधि में दिखाई दी।

फ़िर कुछ दिनों बाद मुझे सात दिनों की समाधि लगी। उस समाधि में हैरत जैसी बात नहीं थी क्योंकि पूज्य गुरुदेव ने उसके लिए पूर्व में हे कह रखा था और एक बार मेरे परिजन समाधि अवस्था देख भी चुके थे। गुरुवाणी हुई थी कि-’मैं सात दिनों तक यहीं पर रहूंगा, कोई चिन्ता मत करना। सुगंधा को कुछ नहीं होगा। उसे कोई नहीं ले जा सकता है।’ इसके कारण सभी आश्वस्त थे। सात दिनों तक मैं समाधिस्थ हो लेटी रही। गुरुदेव ने इन सात दिनों तक प्रतिदिन तीनों प्रहर तक शिवलीलामृत का पाठ करने को कहा था। सुबह-शाम बाळाभाऊ पाठ करते थे और दोपहर में पुष्पा काकी।

समाधि के वक्त पूरे समय तक पुष्पाकाकी मेरे पास ही बैठी रहती थी। बाळाभाऊ और शशिकाका भी जब घर में होते तो पास ही बैठे रहते। मेरे दूसरे देवर जया काका भी ऑफ़िस से आने के बाद मेरे पास ही बैठ जाते थे। समाधि के सातवें दिन बाळाभाऊ को स्वयं गुरुदेव भी मेरे पास बैठे दिखाई दिये। उनकी शिखा खुली हुई थी, वे बाळाभाऊ से मुसकराते हुए कह रहे थे-चिन्ता मत करना, मैं पूरे समय यहीं हूँ।

सातवें दिन पूरे घर में ताजे गुलाब व अन्य सुगंधित फ़ूलों की पंखुडियां चारों ओर बिखर रही थीं। मानो किसी ने उन्हें उछाला हो। मैं जब समाधि से उठी तो उससे पूर्व मेरे शरीरांगों पर भी कुछ पंखुड़ियां अटकी हुई थीं। सभी आश्चर्यचकित थे कि कोई फ़ूल लाया नहीं और लगभग टोकरी भर फ़ूल कहां से आ गये और इन्हें किसने छिड़का? उसी दिन की बात है, भाऊ साहब दवा की रसायनशाला से लौट रहे थे। यकायक उन्हें गुलाब के फ़ूल खरीदने की इच्छा हुई। वे सामान्यत: ऐसी सामग्री कभी खरीदते नहीं थे, बड़ा अस्वाभाविक था उनका एक टोकरी भरके फ़ूल खरीदना। वे जब टोकरी भर फ़ूल लेकर प्रविष्ट हुए तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि उतने ही और वैसे ही फ़ूल पहले से ही घर में रखे हुए है, जो मेरी समाधि टूटने पर एकत्र किये गये थे।

उन्हीं दिनों शाकंभरी नवरात्रि का पर्व आया। यह पर्व पौष मास की अष्टमी से पूर्णिमा तक रहता है। गुरुभाई बाळाभाऊ के यहां शाकंभरी की पूजा विधिविधान से होती थी। अष्टमी के दिन देवी को 60 प्रकार की सब्जियां बनाकर भोग धराया जाता था। काफ़ी तैयारियां होती थी। उस वर्ष सारे प्रयासों के बाद भी कुल 57 प्रकार की सब्जियों की व्यवस्था हो पाई। बाळाभाऊ बड़े चिन्तित थे, वर्षों का क्रम टूटने का डर था और देवी की पूजा परम्परागत ढंग से न कर पाने का मलाल भी स्पष्ट दिखाई दे रहा था। मैंने उन्हें कुछ सब्जियों के नाम सुझाये पर वे सब 57 में सम्मिलित हो चुकी थीं। वे कहने लगे- अगर कल तक शेष तीन सब्जियों की व्यवस्था नहीं हुई तो तात्या और माई बड़े बिगड़ेंगे। मैंने उनकी मनोदशा भांपकर कहा-कल की बात कल देखेंगे, अभी तो आप जाऒ और आराम से सो जाऒ। आपको सब्जियॊं की कब तक आवश्यकता होगी, ऐसा पूछने पर वे बोले-दोपहर 12 बजे तक। क्योंकि तभी नैवेद्य बनना प्रारंभ होगा। उसके बाद वे अपने घर चले गये।

यही बात सोचते-सोचते मुझे भी नींद आ गई। तड़के 2.45 बजे ध्यान के लिए उठी। ध्यान करने का बाद पानी भरा और कुछ समय दिन उगने में बाकी था तो फ़िर सो गई। सुबह जल्दी ही उठ गई और रोज की तरह साफ़-सफ़ाई में लग गई। सबसे पहले बालकनी में झाडू लगाने गई। वहां देखा तो वे तीन सब्जियां जो नहीं मिल रही थीं, वे वहां रखी हुई हैं। मेरे मस्तिष्क में ध्यान के समय आया अनुभव कौंध गया।

मैं जब ध्यान करने बैठी तो ध्यान में ही मुझे बिल्डिंग के नीचे सब्जी वाला आवाज देता सुनाई दिया। मुझे बाळाभाऊ की समस्या का ध्यान आया। मैंने झांककर देखा तो सब्जी वाले की टोकरी सब्जियों से भरी हुई थी। टोकरी वह सिर पर उठाये हुए था। हमारा घर तीसरी मंजिल पर था। मैंने वहीं से खड़े -खड़े बालकनी से हाथ लम्बे किये और सड़क पर खड़े सब्जी वाले की टोकरी उठा ली। टोकरी को बालकनी में रखा और जो सब्जियां बाळाभाऊ को चाहिये थीं वे ले ली और टोकरी वापस सब्जी वाले के सिर पर रख दी। पानी भरा और वापस सो गई। यह सब ध्यान में ही हुआ। कैसे करीब तीस फ़ीट नीचे मेरे हाथ पहुंचे? बाद में मुझे भी आश्चर्य हुआ।

खैर, सब्जियां मिल जाने की खुशी थी। मैने तुरंत शशि काका को बुलाया और सब्जियां देकर बाळाभाऊ के घर के लिए रवाना किया। शाम को शाकंभरी-पूजा के बाद बाळाभाऊ हमारे घर आये, बड़े प्रसन्न थे। आते ही कहा-सुगंधा तुमने तो कमाल कर दिया। मैंने सारी मण्डियां और सब्जी वालों को छान मारा, मुझे कहीं वे सब्जियां नहीं मिलीं। तुम्हें इतनी भोर में ही ये सब्जियां कहां से मिल गई? कहां से लाई?

मैंने असली बात को छिपाते हुए कहा- कोई खास बात नहीं थी। मैंने बड़े सवेरे ही शशिकाका को भुलेश्वर सब्जी मण्डी में भेजा था। सद्गुरुदेव की कृपा से वहां मिल गई। बात को मैंने पलटा जरूर पर सद्गुरुदेव की कृपा का तो उल्लेख हो ही गया। मुझे अपने गुरुदेव की कृपा का ऐसा प्रसाद मिलता ही रहा है।                  –तुम्हारी बा.

पूर्वप्रसिद्धी ऑगस्ट 2009 शिवप्रवाह

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1 टिप्पणी

Posted by on अगस्त 9, 2011 in नवीन

 

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One response to “समाधि और शाकंभरी पूजा

  1. Anmol Einstein

    जून 13, 2012 at 11:39 अपराह्न

    Can’t Believe!

     

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