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मानो और जानो…। व. राव.

26 अगस्त

धर्म को, ईश्वर को, गुरु को हम मानें या जानें? कुछ के मन में यह प्रश्न उगेगा कि मानने और जानने में अंतर क्या है, और यदि अंतर है तो हम क्या करें? किसे अपनाएं? वस्तुत: अध्यात्म जगत बड़ा अद्भुत है। यहाँ सूत्रों का साम्राज्य है जिसके अर्थ अपने-अपने हैं। इसमें प्रेम की भाषा है जिसे शब्दायित करना न करना स्वविवेक पर हैं। इसकी लगन अनूठी है। मानना और जानना दोनों के व्यापक भाव हैं। यात्रा में एक ठहराव आ गया है। बस उसी स्थान पर कदमताल करते जाना है।

जानना बड़ा चुनौती का कार्य है। जानने में स्वयं को ढालना पड़ता है, उसके जैसा होने का प्रयास करना पड़ता है। जानना बड़ा दुरुह हैं, जबकि सच्चे साधक जानने के लिए जीवन ही समर्पित कर देते हैं। सारा प्रदूषण मानने तक सिमट जाने से ही हुआ है, जानने से परमहंस व शिवस्वरूप बनने का मार्ग खुलता है। मानना प्राथमिक सीढ़ी है और जानना अंतिम पायदान। जो पहली सीढ़ी पर ही अटक गया वह अनेक जन्मों तक वहीं का वहीं खड़ा मिलेगा। जिसने अनुभवियों की बातों पर भरोसा कर जानने के लिए छलांग लगा ली वह साधना के मोती ले ही आता है। सारे ही महाप्रज्ञ हमें जानने को उत्प्रेरित करते हैं, उसे जानकर वही बन जाने को आकर्षित करते हैं, पर हम हैं कि सुविधाभोगी बनकर मानने में ही जिंदगी निकाल देते हैं। यदि हम यह सोच ले कि यही हमारा अंतिम जीवन है, इसी में सबकुछ पा लेना है तो शिव शक्तियां हममें समाहित होने को तत्पर मिलेंगी। मार्ग स्वयं ही खुलते चले जायेंगे। आइए, मानने की सीढ़ी से जानने की ओर बढ़ें।

                                                                       —  वरदीचन्द राव

पूर्वप्रसिद्धी- शिवप्रवाह- फ़रवरी 2007.

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