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धन्य तुम्हारो दर्शन …!

01 सितम्बर

बा का अनुभव

बात १९८५  के आसपास दत्त मंदिर के बनने के पश्चात् की है। हम मुम्बई गिरगाँव में रह रहे थे। एक दिन प्रात: ध्यान में दिखा कि मैं बहुत घने जंगल में जा रही थी। सामने एक बड़ा परन्तु बहुत पुराना खण्डहरनुमा मंदिर नजर आया। मंदिर के सामने दो बड़े स्तम्भ थे जिनके आगे दो सिंह बैठे थे। कुतुहलवश मैं मंदिर के भीतर चली गई। गर्भगृह में अम्बाजी की मूर्ति दिखी। मैं दर्शनार्थ पास गई तो अचानक मूर्ति से आवाज आयी,’यहां नहीं पहले वहां जाओ।’ एक हाथ से माताजी ने बाहर के स्तंभ की ओर इशारा किया और कहा, ’वहां मेरा नानू है।’ मैंने उस स्तंभ की तरफ़ देखा तो वहां गणेशजी की मूर्ति दिखी। मैं तुरंत बाहर आयी और गणेशजी को नमन् किया। फ़िर पुन: गर्भगृह में गई। वहां माताजी की हरी चोली और गुलाबी ओढ़नी पहने जीवंत प्रतिमा थी। उनकी आँखों की पुतलियां और हाथों की उंगलियां हिल रही थी। मैं कुछ समय तक उन्हें निहारती रही। जब मैंने उनका मुखमण्डल देखा तो बड़ा आश्चर्य था कि मुझे उसमें अपना ही चेहरा नजर आने लगा। इसी क्षण घर में किसी ने आवाज लगाई और मेरा ध्यान भंग हो गया।

इस दर्शन के बाद मेरे मन में माताजी का मंदिर बनाने की तीव्र इच्छा जाग्रत हो गई। उस समय मेरी परिस्थितिय़ां अनुकूल नहीं थी किंतु धीरे-धीरे अनुकूलताएं बनती गई। सन १९९० में राजस्थान के तलवाड़ा के एक मूर्तिकार श्री नारायण से मुलाकात हुई। मैंने उसे अंबाजी की ५ फ़ीट ऊँची अष्टभुजा वाली एवं सिंह पर सवार वैसी ही मूर्ति बनाने के लिए कहा जैसी मैंने ध्यान में देखी थी। मूर्तिकार कहने लगा कि उसने आज तक दो से ढाई फ़ीट की मूर्तियां ही बनायी है, इतनी बड़ी मूर्ति कैसे बना पाऊंगा? मैंने कहा कि गुरुदेव और माताजी का नाम लेकर काम शुरु करो।  बाकी सब वो संभाल लेंगे। मूर्तिकार श्री नारायण को मूर्ति बनाने में करीब एक वर्ष का समय लगा। अक्षय तृतीया, १९९२ में  माताजी का मंदिर बनाकर उसमें नवचंडी के पाठ और हवन से मूर्ति की स्थापना हुई ।

स्थापना के बाद हम प्रसिद्ध शक्तिपीठ अम्बाजी (गुजरात) गए। वहां अम्बाजी के समक्ष प्रज्वलित ज्योति से लौ लानी थी। मन में यही इच्छा थी कि शिवपुरी में भी अम्बाजी की ज्योति ही जले। सावधानी के तौर पर हम तीन दीपक साथ ले गए। तीनों दीपक अम्बाजी की ज्योति से प्रज्वलित कर स्टील के डिब्बे, जाली के बर्तन और थाली में अलग-अलग रखे। पुत्र दत्तप्रसाद, पुत्रवधु राधिका और मैंने एक-एक दीपक लिया और सावधानी से गाड़ी में बैठ शिवपुरी लौटे। दो दीपक सुरक्षित जलते रहे थे जिनमें एक से अखण्ड ज्योति और दूसरे से यज्ञ मण्डप में धूणी प्रज्वलित की। आज भी अखण्ड ज्योति और धूणी निरन्तर प्रज्वलित हैं।

मूर्ति स्थापना के बाद पहली शारदीय नवरात्रि आयी। हम सभी पास के लीलवासा गाँव में माताजी के गरबों के निमन्त्रण पर गए थे। रात्रि को देरी से लौटे। जब हम लीलवासा में थे तो शिवपुरी में माता के मंदिर में एक अद्भुत घटना घटी। गाँव के कुछ काश्तकारों ने सिंह की दहाड़ सुनी। वे दौड़ कर आवाज की दिशा में भागे। आवाज सुनते-सुनते वे माता के मंदिर पहुँचे । उन्होंने मंदिर में दो सिंह घूमते देखे। मंदिर के भीतर से प्रकाश नजर आ रहा था। उन्होंने जोरो से चौकीदार को आवाज लगाई। चौकीदार हुका भाई मंदिर के पिछवाड़े सो रहा था। काश्तकारों को डर था कि कहीं सिंह उस पर आक्रमण न कर दें, इसलिए उसे भागने को कहा। चौकीदार भी हड़बड़ा कर बाहर आया तो उसने मंदिर में दो बड़े जीवों को घूमते देखा लेकिन डर के मारे न तो उसने उन्हें ध्यान से देखा और न ही वह वहां रुका। उसके साथ-साथ सभी लोग वहां से भाग खड़े हुए। लीलवासा से लौटने पर मुझे यह घटना सुनाई। मैंने उनसे कहा कि आप लोग मंदिर में क्यों नहीं गए? वहां जाते तो माताजी के साक्षात् दर्शन हो जाते। वे कहने लगे कि सिंह की गर्जना ही इतनी भयानक थी कि हमें तो अपनी जान की चिंता हो रही थी। ऐसे में ऊपर जाने का साहस कौन करता?

जब से हरिसिद्धि अम्बाजी की स्थापना हुई, कोई भी अकेला मंदिर में जाने का साहस नहीं जुटा पाता। जो भी कुछ समय के लिए ही सही मंदिर में अकेला रहा उसे कभी पायल की, कभी चूड़ियों की, कभी घुंघरुओं की आवाज सुनाई देती, तो किसी को लाल घाघरा-चोली पहने एक बालिका बाहर से दौड़ती हुई मंदिर में प्रवेश करती नजर आती है।

गिरगाँव में ध्यान के उस द्रष्टान्त के बाद किसी भी कार्य गणेशजी के स्मरण से ही शुरु करती हूँ। यहाँ तक कि रोज के सत्संग, आरती और जाप की शुरुआत भी ’वक्रतुण्ड महाकाय, सूर्य कोटि समप्रभ:, निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा’ का कर ही करती हूँ। आज भी माता की वह वाणी ’पहले नानू’ मेरे कानों में स्पष्ट गुंजती है। कई वर्षों तक मेरे मुख से ’शंभू-शंभू’, ’नानू-नानू’ का उच्चारण अनायास ही निरन्तर होता रहा।…………..आपकी अपनी बा.

पूर्वप्रसिद्धी शिवप्रवाह ऑक्टोबर 08.

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One response to “धन्य तुम्हारो दर्शन …!

  1. smita amit hardikar

    अक्टूबर 8, 2013 at 11:35 अपराह्न

    Navratri me hi ye anubhav padha to jaise mata ke darshan ho gaye.

     

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