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नवाह्न अनुष्ठान – रूपरेखा

08 सितम्बर

 Navadurga-4

(गणेशविसर्जन  के बाद सब को इंतजार है नवरात्री का ..| इस विषय में साक्षात् प्रभु बा का मार्गदर्शन!)

नवरात्रि महोत्सव काशी शिवपुरी आश्रम का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पर्व है। शक्ति पीठ के रूप में विदित इस सिद्ध आश्रम में नवरात्रि की तैयारियां अपने आप में एक अनुष्ठान होता है। सम्पूर्ण आश्रम परिसर का रंगरोगन, साजसज्जा, आगंतुक साधकों के लिए आवास की योजना से प्रारंभ होकर हरसिद्धि अम्बाजी के विग्रह का मनोरम शृंगार, साधक- साधिकाओं द्वारा नौ दिन की स्वयं सज्जा की योजना, सम्पूर्ण कालावधि में पूजा-अर्चना की तैयारी, गरबा-रास हेतु मण्डल की रचना, सर्व मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अखण्ड ज्योति कलशों की सजावट व तैयारी तक गहमागहमी और उल्लास भरे वातावरण में सब मनोरथ पूर्ण होते हैं।

नवरात्र में पूजा का अपना विधान है। घट स्थापना अर्थात् प्रतिपदा के दिन आदिशक्ति महामाया के अंगों से पार्वती, उमा, रमा, शारदा, सरस्वती, दुर्गा, महाकाली आदि देवियां शक्ति के रूप में निसृत हुई हैं। अतएव घट स्थापना के साथ ही देवी की छवि या प्रतिमा के समक्ष एक कलश में नौ आम के पत्ते श्रीफ़ल सहित धराए जाते हैं। एक गरबा-कलश लेकर उसमें दीप प्रज्वलन किया जाता है। गरबे के छिद्रों से प्रस्फ़ुटित प्रकाश अष्ट सिद्धि व नव निधि के आगमन का प्रतीक है। इसी दिन माँ के समक्ष मिट्टी के जवारा-पात्रों में नौ प्रकार के धान (गेहूँ, जौ, चना, चौलाई, उड़द, मूंग, ज्वार, मटर व तिल) बोए जाते हैं। माँ की प्रतिमा को सुन्दर वस्त्र- आभूषणों से शृंगारित किया जाता है। अखण्ड ज्योति जाग्रत की जाती है। सम्पूर्ण नवरात्रि के काल में उपवास करते हुए दुर्गा की आराधना के लिए नवाह्न मंत्र (ॐ ऐं ह्रीं क्लिं चामुण्डायै विचै।) का जाप करते कुंकुमार्चन किया जाता है। नौ दिनों तक माँ की गोद भरी जाती है। इसमें नारियल, हल्दी, कुंकुम, चूड़ियां, पायल, बिछियां, मंगलसूत्र, बिंदियां, आईना, चावल आदि सामग्री का समर्पण होता है। माँ को हर रोज चना-गुड़, पूरण पूड़ी, पकौड़ी, तुअर की सादी दाल, चने की दाल से निर्मित व्यंजनों का नैवेद्य चढ़ाया जाता है। नैवेद्य के साथ मुखवास भी होता है। दिन की पूजा के बाद रात्रि को आरती से माँ की पूजा होकर गरबों से उन्हें रिझाया जाता है। कन्याओं व साधिकाओं द्वारा संतुलित शृंगार करके गरबा-नृत्य की प्रस्तुति को देखने तो कहा जाता है कि देवता भी भू लोक में आते हैं। माँ की अभ्यर्थना का सही समय तो मध्यरात्रि को ही आरंभ होता है। अंत में गरबों की दिव्य-ज्योति से आरती द्वारा शक्ति-संचय का अनुष्ठान होता है। यह क्रम नौ ही दिनों तक चलता है।

ललिता पंचमी पर नौ सुहागिनों को भोजन कराकर उनकी गोद सुहाग के प्रतीकों से भरने का प्रावधान है। सप्तमी को फ़ुलोरा होता है। इस दिन माँ को फ़ूली हुई खाद्य सामग्री ही चढ़ाई जाती है। इनमें पूरी, सिका हुआ धनिया, तले हुए सागूदाने, हरी सब्जियां व बहुबीजी अर्पित किए जाते हैं। अष्टमी को नौ कुमारिकाऒं को भोजन कराकर उन्हें शृंगार सामग्री भेंट की जाती है। कन्यापूजन के समय उन्हें माता के स्वरूप में ही पूजा जाता है। इसी दिन माताजी के समक्ष होम का आयोजन होता है जिसमें नारियल, चोली व साड़ी की आहुति होती है। नवरात्र की पूर्णता पर दशहरे पर बड़ा हवन किया जाता है। माँ की चाँदी के कलदार से गोद भरी जाती है, घट, कलश एवं जवारापात्रों का विसर्जन किया जाता है। सभी नौ दिनों तक आने वाली सुहागिनों की हल्दी, कुंकुम से गोद भराई कर दूध व चना के प्रसाद से सत्कार किया जाता है। इस समय’काली दुर्गे नमो नम:’ का पाठ करते हुए यह कर्म सम्पन्न किया जाता है। रावण के रूप में मानव मन में घुस आई आसुरी शक्तियों यथा-अहं, राग, द्वेष, ईर्ष्या, लोभ आदि का दहन करने का विधान है। पूरे नवरात्रि काल में गेहूँ व उससे निर्मित पदार्थ तथा आम का प्रयोग नहीं करना श्रेयस्कर होता है।          ———–तुम्हारी अपनी ’बा’

शिवप्रवाह ऑक्टोबर 07.

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One response to “नवाह्न अनुष्ठान – रूपरेखा

  1. pankaj2011patel

    सितम्बर 11, 2011 at 8:37 पूर्वाह्न

    jay mataji

     

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