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सहारा हो तो ऐसा हो।

11 सितम्बर

हमारी गुरुपरम्परा में गुरु का स्थान माता-पिता से भी ऊपर क्यों माना जाता रहा है? हमारी संस्कृति की मान्यता रही है कि माता धरती का काम करती है, जड़ों का काम करती है, नीचे से रस देती है, उसकी स्मृति मात्र रस देने वाली होती है। पिता आकाश का काम करता है। आकाश यानी खुलापन। वह दूर से छाया देता है, प्रकाश देता है और ऊपर की ओर खींचता है।

यह ऊपर खींचने का कार्य और नीचे से रस देने की क्रिया दोनों आवश्यक होते हैं। व्यापकता और गहराई व्यक्ति के विकास के दो आयाम हैं । पर गुरु क्या करता है? गुरु के बारे में कहा गया है-वह शिष्य को फ़िर  से अपने गर्भ में धारण करता है और उसे पुन: जन्म देता है। उसे द्विज बनाता है। वह पिता भी है और माता भी है। इसलिए गुरु में पिता की तरह कठोरता, निस्संगता, खुलापन,ऊर्जा, दुर्धर्ष पौरुष आदि तथा माता की तरह स्नेह, कोमलता, ममता आदि होती है।

गुरु हमें विचार से मनन के धरातल पर बार-बार ले चलता है। वह जानता है कि विचार का आशय है ऐसी गति जो दिखती तो है, स्थानांतरित भी करती है पर सतही माध्यम में ही। जबकि मनन का अर्थ है गहनता में उतरते चले जाना। विचार बाहरी भटकन का प्रलोभन है जबकि मनन भीतरी यात्रा का प्रवेश द्वार। गुरु हमें उस द्वार तक अँगुली थामे ले जाने को संकल्पबद्ध है। शिष्यत्व को घटित करना भी गुरु का ही गुरुत्व है, अत: हमें तो गुरु के भरौसे अपनी नैया छोड़ देनी भर है पार तो उसे कराना है।…संपादक.

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One response to “सहारा हो तो ऐसा हो।

  1. upendradubey

    सितम्बर 13, 2011 at 10:52 पूर्वाह्न

    काश ऐसा गुरु मिले तो जीवन कितना आसान बन जाये …बहुत सुन्दर …

     

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