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धारणा का स्वरूप

15 सितम्बर

चित्त को किसी स्थान-विशेष में बांधना, किसी ध्येय-विशेष में स्थिर करना, यही धारणा का स्वरूप है। ध्यान व योग जगत के अनुसार बारह प्राणायामों की एक धारणा होती है, बारह धारणाओं का एक ध्यान होता है और बारह ध्यान की एक समाधि होती है। समाधि को योग का अंतिम अंग कहा गया है। समाधि से सर्वत्र बुद्धि का प्रकाश फ़ैलता है। जिस ध्यान में केवल ध्येय ही अर्थरूप भासता है, ध्याता निश्चल महासागर के समान स्थिर भाव से स्थित रहता है और ध्यानस्वरूप से शून्य सा हो जाता है, उसे समाधि कहते हैं। जो योगी ध्येय में चित्त लगाकर सुस्थिर भाव से उसे देखता है और बुझी हुई आग के समान शांत रहता है, वह समाधिस्थ कहलाता है।

समाधिस्थ साधक न सुनता है न सूंघता है, न बोलता है न देखता है, न स्पर्श का अनुभव करता है न मन से संकल्प-विकल्प करता है, न उसमें अभिमानवृत्ति का उदय होता है और न वह बुद्धि के द्वारा ही कुछ समझता है। केवल काष्ठ के भाँति स्थित रहता है। जैसे वायुरहित स्थान पर रखा हुआ दीपक कभी हिलता नहीं-निस्पंद बना रहता है, उसी तरह समाधिनिष्ठ शुद्धचित्त योगी भी उस समाधि से कभी विचलित नहीं होता-सुस्थिर भाव से रहता है। इस प्रकार उत्तम योग व ध्यान का अभ्यास करने वाले योगी व ध्यानी के सारे अंतराय शीघ्र नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण विघ्न भी धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं।—राजयोगी प्रभु बा

ऑगस्ट 07 शिवप्रवाह

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Posted by on सितम्बर 15, 2011 in नवीन

 

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