RSS

अनुभवोंके आलोक में राजयोगी प्रभु बा

16 सितम्बर

अनुभवोंके आलोक में राजयोगी प्रभु बा (श्री नृसिंह सरस्वती के प्रसाद पदचिन्ह प्रगटन)


बा के अनुभवों की अगली कड़ी

दत्त मंदिर की स्थापना के कोई तीन वर्ष बाद की बात है। मैं और परिजन मुम्बई से गाँव आए। अवसर था अक्षय्य तृतीया पर हवन और भंडारा आयोजित करना। इस पर्व से कुछ दिन पूर्व ही मुझे नींद में किसी बालक के रोने की ध्वनि बार-बार सुनाई देती थी। दत्त मंदिर में उन दिनों टाईल्स लगाने का कार्य चल रहा था। एक रात फ़िर नींद में बालक का रुदन सुनाई दिया। नींद में ही मुझे दिखाई दिया कि मैं मंदिर के प्रथम तल के कमरे से नीचे सीढ़ियों से उतर रही हूँ । रुदन की आवाज दत्त-मंदिर से आ रही थी। उत्सुकतावश झांककर देखा तो पाया कि एक शिशु दत्त गुरु की प्रतिमा के आगे फ़र्श पर रेत के छोटे से ढेर पर लेटा है और रोये जा रहा है। मैं अवाक सी उसे देख रही थी तभी बालक की आवाज आई – “आम्ही इथेच रहाणार.” अर्थात हम यहीं रहेंगे। इसी के साथ मेरी नींद उचट गई। खूब सोचा पर इस घटनाक्रम का आशय कुछ समझ में नहीं आया।

प्रात: ध्यान में जब मानस -पूजा चल रही थी तभी सद्गुरुदेव ने उस स्वप्न की गुत्थी का खुलासा किया। उन्होंने कहा-’वे तो दत्त गुरु के तृतीयावतार स्वामी नृसिंह सरस्वती हैं जो बाल-स्वरूप में आए हैं। यहाँ शिवपुरी में न पण्डे, पुजारियों का जमघट, न अन्य कोई धमचक। बड़ी शान्ति है, इसलिए वे यहीं रहना चाहते हैं।’

मैं ध्यान से उठी। स्नानादि से निवृत्त होकर शीघ्रता से मंदिर पहुँची। आशंका थी कि कहीं मिस्त्री-मजदूर पहले नहीं पहुँच जाएं और रेत के ढेर को हटा न दे। मूर्ति के समक्ष रेत का छोटा सा ढेर यथावत था। उस पर शिशुपद के चिह्न भी स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। मैंने साष्टांग प्रणाम किया। तब तक कारीगर भी आ गये। उनसे कहकर उस बालू के ढेर के चारों ओर तुरंत ही एक चबूतरा बनवा दिया। दत्त-प्रतिमा के सम्मुख बनी इस पीठ पर मार्बल जड़वाकर उस पर प्रतीक स्वरूप संगमरमरी चरण-पादुकाएं भी स्थापित कर दी। पादुकाऒं की स्थापना के बाद जब मैं अहोभाव से परिपूर्ण हो सिर टेककर नमन कर ही रही थी कि ध्यान लग गया और फ़िर ध्यान समाधि में परिवर्तित हो गया।

करीब दो घंटे तक मैं इसी नमन-मुद्रा में रही। फ़िर शशि काका, प्रसादे मामा और माँ ने मुझे उठाने का उपक्रम किया। मेरा पूरा शरीर अत्यंत भारी और काष्ठवत हो गया था अत: वहीं लेटा दिया गया। मेरा सिर दत्त प्रभु की प्रतिमा की ओर था और पैर मंदिर के प्रवेशद्वार की ओर। करीब 8 घंटो तक समाधि लगी रही फ़िर चेतना आई।

उस दिन सद्गुरुदेव ने अनेकानेक निर्देश देने की अनुकम्पा की। वे बोले- ’शिवपुरी में नरसोबा वाडी (स्वामी नृसिंह सरस्वती का मूल स्थान) का महात्म्य उद्भूत होगा। इस स्थान से कोई भी आगंतुक कभी भी भूखा नही जायेगा। कौआ पितररूपा है, गाय में सभी देवों का वास है तथा कुत्ता बिना झोली का साधु है इसीलिए इन तीनों की प्रतिदिन उदरपूर्ति-व्यवस्था होनी ही चाहिए आदि-आदि।

उस दिन से शिवपुरी आश्रम का अंगभूत नियम सा बन गया है कि हमेशा प्रसादी के पाँच भोग निकलते हैं। प्रथम भगवान को, दूसरा अतिथि देव को, तीसरा कौओं को, चौथा गोमाता को तथा पाँचवा भोग कुत्तों के लिए जाता है तब आश्रमवासी प्रसाद पाते हैं। प्रतिदिन प्रथम आहुति के रूप में अग्नि को भी घी व चावल का भोग लगता है। गुरुकृपा से यह क्रम अनवरत जारी है।—अपनी ही प्रभु बा.

पूर्वप्रसिद्धी डिसेंबर 08 शिवप्रवाह

back to अमृतानुभव

back to Guruvaanee.

Advertisements
 

टैग:

One response to “अनुभवोंके आलोक में राजयोगी प्रभु बा

  1. pankaj2011patel

    सितम्बर 16, 2011 at 9:03 पूर्वाह्न

    jay shree krishna

     

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: