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मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा

18 सितम्बर

स्वयं परमात्मा ने अपने श्रीमुख से भक्ति के संदर्भ में माता शबरी से कहा है- ‘मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा।’ यह मंत्र शक्ति जब नाम की शक्ति के साथ संयोजित हो जाती है तो इसकी महिमा बहुगुणित हो उठती है। कलिकाल में ईश्वरीय अनुकम्पा का अवदान पाने के दो सुलभ व सरल साधन है-एक ध्यान और दूसरा नाम जप। यह नाप जप ही मंत्र जाप है। यों तो अखिल ब्रह्माण्ड में अनेकानेक मंत्र हैं, पर सद्गुरुदेव की करुणा से प्राप्त मंत्र महामंत्र की श्रेणी में आता है। यही महामंत्र नाम जप की दशा में ध्यान की आधारभूमि बनता है। ध्यान की एक सीमा है, मर्यादा है। ध्यान के लिए समय, स्थान, परिवेश और भावदशा सभी का संयुक्त सुयोग अनिवार्य होता है, पर नाम जप तो हम हर क्षण हर दशा में, हरेक कार्य के साथ कर सकते हैं। सतत व स्वाभाविक सुमिरण ही अजपा जप बनकर साधक का उत्कर्ष करता है।

शक्तिपात साधना पद्धति में महामंत्र ( सद्गुरुदेव प्रदत्त मंत्र) के जाप का आत्यंतिक महात्म्य है, क्योंकि वह उनके द्वारा सिद्धि के धरातल से प्रकट होता है। इसीलिए उसका प्रभाव त्वरित अनुभव होता है। जो साधक अपने मन से, किसी अन्य के सुझाने से अथवा जिज्ञासावश ही अन्य मंत्र का जाप करने लग जाते हैं उनकी साधना निष्प्रभावी हो सकती है।

हमारे शरीर में षट्चक्र की संरचना है। प्रत्येक चक्र के भेदन हेतु विशिष्ट जप संख्या निर्धारित हैं। सद्गुरुओं के निर्देश हैं कि दिनभर में कुल 210600 जाप अनिवार्य हैं। मंत्र जाप पूरी श्रद्धा और तल्लीनता से करना चाहिए। जाप में मंत्रोच्चार एवं श्वासोच्छवास का एकाकार हो जाना ही तल्लीनता है। ईश्वर के स्वरूप का चिंतन करते हुए किया गया जाप ही फ़लीभूत होता है। मंत्र जाप में ईश्वरीय के नाम स्वरूप का तत्त्व होता है अत: उसे नाम लेना भी कहते हैं। यही नाम जप जब गेय हो तो भजन बन जाता है, जब ईष्ट की चरित्र-लीलाऒं का संगान बनता है तो कथा का स्वरूप ले लेता है। स्वरूप चाहे विलग-विलग हों पर उद्देश्य एक ही है- ‘उस परमपिता परमेश्वर का चिंतन। उसके प्रेम का दिल में जागरण।’ सृष्टि का विधान है कि जब परमात्मा के प्रति प्रेम जाग्रत हो जाता है तो अहर्निश उसी प्रेमी की याद सताती है। और किसी में मन लगता ही नहीं है। प्रतिपल उसके सान्निध्य की आकांक्षा बनी रहती है और अनन्य भाव विकसित हो जाता है। इस भाव के विकास से साधक में सुख, दु:ख, मोह, माया, ईर्ष्या, लोभ, पाप, पुण्य, राग, द्वेष आदि गुणावगुण स्वत: तिरोहित हो जाते हैं। उसकी साधना ’सहज-साधना’ बन जाती है। जैसे व्यवसाय में डूबा व्यापारी, क्रीड़ा में लीन बालक, विद्योपार्जन में रत जिज्ञासू, गृहस्थी को संवारने में जुटी संसारी को अपने कर्म में अनन्यता होती है, वे भूख-प्यास आदि का भी विस्मरण कर लक्ष्य प्राप्ति में संलग्न रहते हैं, वैसे ही हाल ईश्वर-पथ के पथिक साधक के साधना-काल में होते हैं। नाम संकीर्तन करते-करते, महामंत्र का जाप करते-करते साधक का मन शुद्ध होने लगता है, वाणी पवित्र होने लगती है, शरीर में असीमित ऊर्जा का संचार होने लगता है, अंतस्ं में  प्रेम का स्रोत फ़ूट पड़ता है, चेहरे पर अद्भुत तेज का प्राकट्य होने लगता है, उसकी परमात्म-प्रेरणा उच्चासन पर चढ़ने लगती है और इस दशा में उसका ध्यान लग जाता है, उसका ध्यान सध जाता है, उसे साधना की परमावस्था की संप्राप्ति हो जाती है और वह समाधि को, मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।

ध्यान का अर्थ है चित्त को निर्विकल्प, निर्विचार, निर्लिप्त अवस्था में स्थापित करना। यह साधना, विकारों से मुक्ति के बाद ही सधती है। विकारों से मुक्ति का मार्ग है नियमित जप, कीर्तन और भजन। मंत्र हमें ध्यान तक ले जाता है, ध्यान मुक्ति तक की यात्रा कराता है। अत: ये सम्पूरक है।

साधकों को इन दिशाओं में प्रविष्ट होने से पूर्व दो बातों पर ध्यान देना अपेक्षित है। एक तो ‘मंत्र की सिद्धि के लिए श्रद्धा व विश्वास की युगल जोड़ी आवश्यक है।’ श्रद्धा व विश्वास के बिना मंत्रोच्चार कोरी शाब्दिक व थोथी क्रिया है, और दूसरे ‘सद्गुरु प्रदत्त मंत्र का प्रयोग ही सिद्धिकारक है।’ क्योंकि यह पूर्व में ही उनके द्वारा करोड़ो बार जाप्यानुष्टान से सिद्ध किया होता है। हमें तो तैयार खाद्य के रूप में उसका रसास्वादन ही तो करना होता है। मेरे प्रिय साधक, तुम्हारा भी मंत्र सधे व ध्यान लगे, यही मेरा आशीर्वाद।
—तुम्हारी अपनी बा

पूर्वप्रसिद्धी शिवप्रवाह सप्टेम्बर 07.

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2 टिप्पणियाँ

Posted by on सितम्बर 18, 2011 in नवीन

 

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2 responses to “मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा

  1. praveendra

    जून 7, 2013 at 1:49 पूर्वाह्न

    Kripya kr btae naam jp ki sankhya 210600 hae ya 21600 hae.

     
  2. pankaj2011patel

    सितम्बर 21, 2011 at 6:18 पूर्वाह्न

    naye sadhkoke liye khub jaruri lekh. jay shree krishna.

     

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