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शक्ति के दो आयाम

04 अक्टूबर

मनुष्य मात्र में शक्ति का असीम भण्डार है। किन्तु ये शक्तियां अधिकतर सुषुप्तावस्था में होती हैं। मुझे लगता है कि हमारी सारी साधनाएं सुप्त और गुप्त शक्तियों को जगाने के उपक्रम ही हैं। ध्यान रहे, जैसे सुप्त शक्ति की कोई निष्पत्ति नहीं होती, वैसे ही जाग्रत होकर अनियंत्रित शक्ति की कोई सद्वृत्ति नहीं होती है। शक्ति को जगाए बिना मनुष्य चरम और परम से वंचित ही रहता है तो शक्ति का सदुपयोग किए बिना वह शक्ति का दास होकर स्व-पर का र्‍हास ही कर सकता है।

आवश्यकताएं दोनों ही हैं। जगाना भी जरूरी है तो नियंत्रण भी। जगाने के लिए स्वयं के प्रयोग कभी-कभी परिणामकारी हो सकते हैं, अपना मार्ग भी उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है किन्तु नियंत्रण की साधना को अनुभवों की पाल से ही बांधा जा सकता है। अत: अनुभवियों की संगति का चलन संभवत: इसी लक्ष्य के लिए बना है।

और यदि जागरण में भी अनुभव जुड़ जाए तो हमारी अधिकांश ऊर्जा संरक्षित होकर शिवभाव के लिए लग सकेगी। शक्ति संचय का पर्व एक बार फ़िर समुपस्थित है, उक्त दोनों आयामों पर गति सधे ऐसी शुभकामनाएं।………….वरदीचन्द राव.

पूर्वप्रसिद्धी-शिवप्रवाह ऑक्टोबर ०७.

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1 टिप्पणी

Posted by on अक्टूबर 4, 2011 in नवीन

 

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One response to “शक्ति के दो आयाम

  1. pankaj2011patel

    अक्टूबर 6, 2011 at 10:03 पूर्वाह्न

    jay shree krihna

     

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