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आश्रम तो मानसरोवर है।

21 अक्टूबर

आश्रम केवल भवन  ही नहीं होता है जहाँ अनेक लोग एकत्र होकर ईश्वर का नाम लेते हों। वस्तुत; आश्रम एक जीवन व्यवस्था है, जीवन शैली है। आश्रम में रहने का अर्थ है अपने सद्गुरु के स्थान पर, सद्गुरु द्वारा बताए गए विधि-नियमों का मन से पालन करते हुए आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु साधना में लीन रहना।

सद्गुरु जहाँ भी रहते हैं, वह स्थान स्वत: आश्रम हो जाता है। ऐसे में सद्गुरु यदि स्वयं कोई आश्रम बनाते हैं तो शिष्यों का परम सौभाग्य होता है। ऐसे आश्रम गुरु परम्परा के आशीर्वाद एवं कृपा से ही बनते हैं। आश्रम एक तपस्थली होता है जहाँ की हर एक ईंट में सद्गुरु का तप, हर दीवार में सद्गुरु की साधना का बल, उसके प्रांगण के कण-कण में सद्गुरु का प्रेम, करुणा और ममता व्याप्त होती है। आश्रम परिसर के वायुमण्डल में सद्गुरु के श्वांस की पवित्रता होती है। यहाँ से प्रसारित ऊर्जा तरंगें कोसों दूर फ़ैल कर शिष्यों को आवेशित करती रहती हैं। इसलिए आश्रम शक्ति के केन्द्र होते हैं। यहाँ दिव्यता, चित्त की शांति और ध्यान की ऊँची अनुभूतियाँ बरसती रहती हैं। आश्रम ध्यान के लिए उत्तम स्थल होता है क्योंकि यह एक सिद्ध-पीठ होता है।

वह आश्रम जीवन्त शक्तिपुँज होता है जहाँ चित्ती-शक्ति एवं कुण्डलिनी शक्ति का अजस्र प्रवाह होता है। संतों और सिद्धों की पावन कृपा भूमि होने के कारण इस परिसर के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी आदि में भी चित्ती-शक्ति जाग्रत रहती है इसीलिए आश्रमवासी साधक शीघ्र उच्च अनुभूतियाँ पा लेता है। इस दिव्यता एवं पावनता को सद्गुरु निरन्तर अभिवृद्धित करते हैं। उनका अखण्ड नाम जाप चल्ते रहना इसका हेतु है।

आश्रम में साधक भी रहते हैं क्योंकि साधकों से ही आश्रम की व आश्रम से ही साधकों की शोभा है। कई साधक स्थायी तौर पर तो कुछ दीर्घ या अल्पकाल तक निवास करते हैं। साधकों के ध्यान, जाप, पूजा-पाठ, सत्संग, उनकी वाणी, विचार, व्यवहार एवं अंतर्मन की भावना का प्रवाह आश्रम के वायुमण्डल का निर्माण करता है इसीलिए ’बा’ कहती हैं कि आश्रमवासी साधकों को नियमित ध्यान व मंत्र जाप करते रहना चाहिए। वाणी में सौम्यता व मधुरता रहें, सत्य संभाषण करें तथा निन्दा-ईर्ष्या से मुक्त व्यवहार हो क्योंकि आश्रम एक योगाग्नि केन्द्र होता है। जहाँ साधकों के पाप भस्मीभूत होकर शून्य हो जाते हैं, इसीलिए साधक का आश्रमवास एक साधना ही है। इसके विपरीत जो साधक साधना से मुँह मोड़ता है, विषय भोग में लिप्त रहता है वह शक्तिहीन व निस्तेज होकर पथच्युत हो जाता है।

आश्रम से जुड़े प्रत्येक साधक का एक-दूसरे में सद्गुरु के आत्मरूप का दिग्दर्शन करने का भाव हो तथा तदनुरुप व्यवहार भी हो। आश्रम में रहते हुए आरती, ध्यान, सत्संग, गुरुगीता, गुरुचरित्र पारायण, संध्या, मानस पूजा आदि सभी स्वयं कल्याण के लिए किये गए कार्य हैं। इसे आश्रम की सेवा नहीं कहा जा सकता है। आश्रम की सेवा का अर्थ अपनी शारिरीक क्षमतानुसार कार्य करना है यथा साफ़-सफ़ाई, अन्नपूर्णा-सेवा, गो-सेवा, बाग-बगीचे की देखभाल एवं साज-सज्जा आदि। इस सेवा का एक ही तात्पर्य होता है कि गुरु-आदेश का परिपालन। जितना कहा जावे उतना ही करने की आस्था। आश्रम में शारीरिक एवं आत्मिक स्वच्छता का पूरा पालन हो तथा भोजन बनाते एवं ग्रहण करते समय भगन्नाम का जाप अनवरत चले तभी वह भोजन न होकर नैवेद्य बनता है। सभी साधक प्रेम भाव से रहें, ईर्ष्या-द्वेष छोड़ें, अच्छाइयाँ चुनें, बुराइयाँ त्यागें, अन्य की प्रशंसा करें निन्दा से बचें, किसी भी प्रति दूषित भाव उत्पन्न हो तो उन्हें तत्काल झटक दें  व अपने किये गए सेवा कार्य का लेखा-जोखा रख कर मर्यादा न तोड़ें।

आश्रम तो मानसरोवर की भाँति है, जिसमें कौआ भी डुबकी लगा कर हंस बन जाता है। आश्रम में आने वाले साधक हंस बनें, आनन्दित रहें। मानव जीवन के उत्कृष्ट गुणों को विकसित कर सद्गुरु से दिव्य शक्ति प्राप्त करें क्योंकि गुरुकृपा ही पूर्णत्व तक पहुँचायेगी।

आश्रम एक जीवित शक्तिपीठ होता है। यह जड़ अथवा अचेतन नहीं है। आश्रम में रहने के लिए गुरु का आशीर्वाद, भाग्य और योग्यता का सम्मिश्रण आवश्यक होता है। ऐसा नहीं है तो कोई वहाँ अधिक दिन तक टिक नहीं सकता हैं। वहाँ प्रवाहित होने वाली चित्ती- शक्ति स्वयं अपात्र व्यक्ति को निकाल फ़ेंकेंगी। जिनकी पात्रता लम्बी अवधि तक बनी रहती है, उन्हें वह पूर्णरूपेण स्वीकर कर लेता है। आश्रम दिव्यद्रष्टा सिद्धपुरुषों के दर्शन, ध्यान की उच्चतम अनुभूतियाँ देकर साधकों का उत्तरोत्तर मार्गदर्शन करता है। सच में सद्गुरु का आश्रम पृथ्वीतल पर साक्षात् स्वर्ग है, शिवलोक है, वैकुण्ठ है। आश्रम में साधक सभी प्रकार के प्राकृतिक एवं दैविक प्रकोपों से सुरक्षित रहते हैं। तीनों लोकों में सिद्धपीठ रूपी सद्गुरु के आश्रम से श्रेष्ठ स्थान और कोई नहीं है। आश्रम में सद्गति प्राप्त होने  काशी में देहत्याग के समान गति मिलती है| इसीलिए सद्गुरु कहते  हैं कि आश्रम में एक बार स्थायी रूप से आ जाओ तो फिर पार्थिव देह ही बाहर निकलनी चाहिये|

पूर्वप्रसिद्धी शिवप्रवाह जुलै 07. गुरुवाणी-गुरुपौर्णिमा पोस्ट

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2 responses to “आश्रम तो मानसरोवर है।

  1. Hitoo

    मार्च 31, 2012 at 11:17 पूर्वाह्न

    Jai Shri Krishna
    Parmanand ki 100% prapti, Pruthvi par kar Utkrusth aur Ajod Sthal.
    Guru ki Fauj Kare Mauj.

     
  2. pankaj2011patel

    अक्टूबर 31, 2011 at 9:59 पूर्वाह्न

    jay shree krishna

     

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