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ज्योतिकलश छलके ।

22 अक्टूबर

 

सामान्य साधकगण, नवरात्रि के पश्चात् आए दीपोत्सव की कोटिश: शुभकामनाएं । शक्ति की उपासना के बाद ज्योति का आगमन एक प्राकृतिक परम्परा है। यह भी कहा जा सकता है कि शक्ति ही ज्योति में रूपांतरित होती है। अंतस् में जितनी ज्योति प्रकटती है, उतनी ही शक्ति साधी गई है, यह भी एक मापन प्रकार है शक्ति संचयन का। स्वाभाविक ही यह प्रश्न आकार लेता है कि शक्ति व ज्योति में क्या अंतर संबंध है?

साधना के क्षेत्र में डूबने वाले जानते हैं कि शक्ति अर्जन है और ज्योति विसर्जन । एक सामान्य सी बात है कि यदि अर्जन ही नहीं होगा तो विसर्जन कैसे हो सकेगा? और यदि अर्जन ही होगा और विसर्जन नहीं होगा तो स्वार्थ ही कहा जाएगा। सिद्धों ने इसे संतुलन की भाषा कहा है। संभवत: यह संतुलन की भाषा ही समाधि भाषा है। इसीलिए जिस भी अवधूत ने जितना भी पाया है उसका कण कण बाँटा है, प्रकृति के संतुलन को साधा है, समाधि को जिया है।

यहाँ साधक के लिए एक बात ध्यातव्य है कि अर्जन और विसर्जन के मध्य परिमार्जन का भी चरण होता है। नवरात्रि के बाद विजयादशमी मनाने का विधान है। यानी कि शक्ति -संचय के साथ यदि कुछ दंभ भी अंकुरित हो गया हो तो उसे साधना की अग्नि में जलाकर ही ज्योति में परिवर्तित करना है। यों  यह पथ सरल भी है और नहीं भी । हमारे पास एक अन्य उत्तम उपाय और है, हमारा सौभाग्य है कि हमें ज्योतिपुंज बा की अनुकम्पा उपलब्ध है, हम अर्जन, परिमार्जन और विसर्जन को साधने के स्थान पर इस ज्योति से ही अपना दीप जला लें, अपने जीवन को शक्तिमय और ज्योतिर्मय कर लें।…सम्पादक.

पूर्वप्रसिद्धी- शिवप्रवाह 07.

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3 responses to “ज्योतिकलश छलके ।

  1. pankaj2011patel

    अक्टूबर 31, 2011 at 9:28 पूर्वाह्न

    jay matadi

     
  2. SinhaG

    अक्टूबर 23, 2011 at 11:32 अपराह्न

    Jyoti Kalashchalke! Aapke blog ke saath saath mujhe Lata Mangeshkarji ka gaana bhi yaad aa gaya.

     

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