RSS

सद्गुरुदेव द्वारा दीपावली की शुभकामना

25 अक्टूबर

सभी साधकों और पाठकों को दीपावली के शुभ अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं एवं नए वर्ष की बधाई। दीपावली का यह पर्व आप सभी के जीवन में आनंद, सुख और खुशियों का प्रकाश लाए, यही मेरी श्रीसद्गुरुदेव से प्रार्थना है ।

गुजराती भाषा में एक भजन है जो अक्सर सत्संग में गाते हैं-

मौज मा रेवू, मौज मा रेवू रे।
अगम अगोचर अलख धणी ने,खोज मां रेवू रे|

आगे की पंक्ति है-

गुरुकृपा एने रोज दिवाली, रंग ना टाणा रे।
देव ने दिवो के धूप शूं देवू, दिल दे देवू रे।
मौज मां रेवू, मौज मां रेवू ।

इसका अर्थ तो आप समझ गए होंगे। जिस साधक पर गुरुकृपा है उसका हर दिन दिवाली है, होली है । गुरुकृपा तो सभी साधकों पर समान रूप से बरसती है । यह तो साधक के ऊपर है कि वो उस कृपा का पात्र बन पाता है या नहीं। उस कृपा को जीवन भर टिकाना भी बहुत जरूरी है। दीपावली प्रकाश का पर्व है। आनन्द का पर्व है।

सद्गुरु कृपा से जीवन में, साधक के अंतर्मन में आत्मज्ञान की ज्योति प्रज्वलित होती है। उसी ज्ञान के प्रकाश से जीवन के अंधकार का नाश होता है । सुख और दु:ख तो हर व्यक्ति के जीवन में आते ही हैं । संत और महापुरुष भी इनसे बच नहीं पाए हैं । फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि सच्चा साधक मन से इन सभी परिस्थितियों से ऊपर उठ जाता है। आत्मज्ञान के प्रकाश में उसे यह साफ़-साफ़ दिखाई पड़ता है कि वह परिस्थितियों को नियंत्रित नहीं कर सकता। केवल स्वयं के विचारों पर, कर्मों पर, हरकतों पर, सोच पर नियंत्रण रख सकता है । अगर मन से वह दृढ निश्चय कर ले तो कोई भी व्यक्ति या परिस्थिति के क्षणों में उसका एक ही आधार है, वो है सद्गुरु।

अपने सद्गुरु पर अटूट विश्वास होना अत्यंत आवश्यक है। सद्गुरु के वचन का प्रमाण मानना चाहिए। कोई तर्क नहीं, वितर्क नहीं । केवल समर्पण, पूर्ण समर्पण ।

ईश्वर को, सद्गुरु को धूप- दीप क्या अर्पित करते हो? दिल देकर देखो। अर्थात सद्गुरु मन का समर्पण चाहते हैं। शरीर का समर्पण गौण है। ईश्वर मन देखता है । जीवन में सद्गुरु का स्थान सबसे ऊपर होना चाहिए। स्वयं के ऊपर, पति-पत्नी से ऊपर, तन से ऊपर, व्यवसाय प्रतिष्ठा से ऊपर, मित्रों से ऊपर, अपने सम्मान से ऊपर। यह ना समझें कि सद्गुरु स्वयं का महत्त्व चाहते हैं । अगर साधक अपने और सद्गुरु के बीच इन में से एक को भी रखता है तो स्वयं ही सद्गुरु से दूर होता चला जाता है। सद्गुरु तो अपने स्थान पर यथावत है । दूरियां हम बढ़ाते हैं। इन सभी दोषों से निरंतर बचना हो तो एक ही उपाय है–निरंतर साधना, सतत सद्गुरु स्मरण।

जो साधक सद्गुरु को सर्वोच्च और सर्वस्व मानता है वो हमेशा परमानंद की लहरों में डोलते रहता है। दु:ख किस चीज का नाम है यह वो नहीं जानता। उसके मन में, अंतस में हर समय आनंद का झरना बहते रहता है। उसके मस्तिष्क में आनंद के अणुओं का निरंतर विस्फ़ोट होता है । वह स्वयं तो प्रकाशित होता ही है अन्य व्यक्तियों के जीवन में भी प्रकाश लाता है। वह स्वयं एक चलता-फ़िरता दीपक है। उसके लिए हर रोज दीपावली है। उसका जीवन एक उत्सव है।

हम सभी बड़े भाग्यशाली है कि हम एक ऐसी परम्परा से जुड़े हैं जिसमें प.पू. सद्गुरु श्री योगीराज गुळवणी महाराज एवं प.पू. स्वामी वासुदेवानन्द सरस्वती(टेंबे स्वामी) महाराज जैसे दीप-स्तंभ हैं, प्रकाश-पुंज हैं। इन आत्मज्ञानी महापुरुषों का तेज हजारों सूर्यों से भी अधिक हैं । इनके कृपाछत्र में रह कर इनकी कृपा किरणॊं को पाकर हम स्वयं के जीवन को प्रकाशित करें । सूर्य ना बने कोई बात नहीं, छोटा सा प्यारा सा दीपक तो बन सकते हैं । शुभ दीपावली।

                …..आपकी अपनी बा

शिवप्रवाह ऑक्टोबर २०१०

BACK TO GURUVAANEE

BACK TO SADGURUSANDESH

Advertisements
 

टैग: ,

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: