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दीपावली

27 अक्टूबर

धन की दीपावली, तन की दीपावली और मन की दीपावली जैसी अनेक शब्दावली प्रचलित हैं। दीपावली पर नए मकानों, नये वाहनों, नये गहनों, नये बर्तनों की खरीदारी आम बात है । नये कपड़ों का प्रबंध, मिठाइयों का निर्माण आदि भी सामान्य नजारा है । ये दोनो प्रकार धन और तन की दीपावली के हैं । संभवत: इसी कारण धन तेरस और रूप चौदस की रचना का एक उद्देश्य यह भी रहा होगा । किन्तु मन की दीपावली तो मूल दीपावली है । धन रहे, खूब कमाई हो अच्छी बात है, स्वास्थ्य अच्छा रहे, रूप- सौंदर्य निरंतर निखरे संतोष की बात है । किन्तु मूल दीपावली इससे ऊपर है । मन की दीपावली वस्तुत: भावों से जुड़ा प्रकरण है । मन में प्रकाश उतर जाए, एक मार्गदर्शी रोशनी समा जाए, मन व्यष्टि से समष्टि तक का विस्तार पा जाए तभी मन की दीपावली होती है । धन और तन की दीपावली तो पुरुषार्थ से आ जाती है, पर मन की दीपावली हेतु अपना समर्पण व सद्गुरु कृपा चाहिए । अपना समर्पण भाव भी सद्गुरुकृपा के बिना कहां फ़लता है? जब शुरुआत ही सद्गुरु कृपा पर निर्भर है तो क्यों अपने समय को जाया करें, क्यों नहीं प्रारंभ में ही शरणागति साध लें । यह हो गया तो नित दीपावली है । निशिदिन मंगल है । हर क्षण महोत्सव है । बधाई ।

—-वरदीचन्द राव. मानद संपादक. ऒक्टोबर 2010 शिवप्रवाह.

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One response to “दीपावली

  1. pankaj2011patel

    अक्टूबर 31, 2011 at 9:34 पूर्वाह्न

    sadguru bhagvan ki jay

     

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