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सद्गुरु कृपा ही केवलम् (प. पू. बा का अनुभव)

11 नवम्बर

दीक्षा मिलने के पश्चात् हमेशा मेरे मन में आता था कि गाँव में एक छोटा सा मंदिर बनवाऊँ। चूंकि पास में पैसे तो थे नहीं इसलिए कोई बड़ी योजना भी नहीं थी, केवल ६x६x४ फ़ीट का मंदिर हो। जब जगह ढूँढ़नी चाही तो पहाड़ी पर या दूर खेतों में जमीन मिल रही थी जो जंगली जानवरों के ड़र से सुरक्षित नहीं थी। गाँव के एक छोर पर मेरे मामाजी स्व. श्री. लीलारामजी की जमीन का एक छोटा टुकड़ा था, जहाँ घर के पशुओं का गोबर, खाद इत्यादि डाली जाती थी। ऐसे ३-४ व्यक्तियों की जमीनों के ६ टुकड़े खरीद लिये। वहाँ भूमि पूजन कर मंदिर निर्माण का कार्य शुरू किया। मुम्बई में घर पर मेहमानों द्वारा बच्चों को जो पैसे दिये जाते थे उन्हें मैं बच्चों के उपयोग में न लेकर जमा करती और गाँव भेजती रहती थी। किसी तरह मंदिर-निर्माण पूरा हुआ। यह बात सन १९७८ की थी। अब बात आयी मूर्ति स्थापना की। पहले गणेशजी की मूर्ति लानी थी। १५०  रुपये लेकर भूलेश्वर (गिरगाँव-मुम्बई) पहुँचे। वहाँ  एक छोटीसी मूर्ति पसंद आयी जिसका मूल्य ३०० रुपये था। निराश होकर अपने घर लौट आये। मुझे विवशता पर बहुत रोना आया। कुछ देर बाद घर के काम का ख्याल आया| आलमारी में रखी साड़ियों को सुखा देती हूँ, यह सोच कर आलमारी में से साड़ियां निकालीं तो उनमें से कुमकुम लगाये हुए तीन नये सौ-सौ के नोट गिरे। मेरे आश्चर्य और खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उन्हें लेकर पुन: गणेश जी की मूर्ति खरीदने के लिए चल दिए।

अगला दिन गुरुपौर्णिमा का था। गुरुपूर्णिमा के १५ दिन बाद श्रीदत्त मूर्ति देखने के लिए भूलेश्वर गए। वहाँ एक-एक फ़ीट की मूर्ति ही जिनकी कीमत २५०० से ५००० रुपये तक की थी। मुझे ढाई फ़ीट की मूर्ति चाहिये थी। मैंने राजस्थान में फ़िर अपने मामाजी से बात कर उन्हें जयपुर भेजा और उन्हें बताया कि मुझे ढाई फ़ीट की मूर्ति चाहिये और कीमत अधिक से अधिक २५०० रुपये हो। किन्तु जयपुर में भी इस कीमत में अधिक से अधिक डेढ़ फ़ीट की दत्त भगवान की मूर्ति का ऑर्डर दे दिया और नमूने के लिए एक तस्वीर भी भेज दी।

करीब ६ महिने बाद मामाजी मूर्ति लेने जयपुर गए तो वहाँ उन्होंने देखा कि कारीगर ने डेढ़ फ़ीट की जगह ढाई फ़ीट की मूर्ति गढ़ दी । और वो उसकी कीमत ५००० रुपये मांग रहा था। मामाजी ने फ़ोन से मुझसे बात की। २५०० रुपये की जगह ५००० रुपये देना असंभव सा था क्योंकि इतनी बड़ी राशि इकट्ठा करने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती थी। मामाजी वापस बस स्टेण्ड की ओर लौट पड़े। पीछे-पीछे उस मूर्तिकार का एक आदमी उन्हें वापस बुलाने आया और बोला कि वैसे यह मूर्ति बन तो गई है पर राजस्थान में तीन मुँह वाली मूर्ति (दत्त भगवान) और कोई खरीदने वाला कहां मिलेगा, इसलिए आप इसे २५०० रुपये में ही ले जाइए। इस प्रकार गुरु कृपा से मुझे मंदिर में स्थापना हेतु मनवांछित मूर्ति मिल गई।

कुछ समय बाद जब हम ईटालीखेड़ा गाँव पहुँचे। पंडित जी से शुभ मुहूर्त दिखलाया। मुहूर्तानुसार ९ मई १९८० अक्षय तृतीया पर स्थापना होनी थी। मन में विचार आया कि गणेशजी और दत्त गुरु के साथ साथ इष्टदेव शिवजी की भी स्थापना कर देनी चाहिए। पुन: एक बार उन्हीं मामाजी को शिवलिंग लाने के लिए केसरियाजी भेजा। कह को १०० रुपये में जैसा शिवलिंग मिले ले आना। मामाजी ने आकर कहा कि १०० रु. में  ४ इंच का शिवलिंग मिल जाएगा में बता आया हूँ। मन में विचार आया कि यदि शिवलिंग ८ इंच का होता तो ठीक रहता क्योंकि उस पर बिल्वपत्र आदि चढ़ाने में सुविधा रहती पर अब क्या हो सकता है? वापस कुछ दिन में मामाजी शिवलिंग लेने के लिए गए तो आश्चर्य था कि शिवलिंग ८ इंच का ही बनाया गया था और वह भी १०० रु में ही मिला। इस तरह सद्गुरुकृपा से मन की इच्छा पूर्ण हुई। तीनों ही मूर्तियों के संदर्भ में ऐसी घटनाएं घटी जिसका कोई जवाब नहीं।

मूर्तियों की स्थापना से पहले ’दिगम्बरा, दिगम्बरा, श्रीपाद वल्लभ दिगम्बरा’ की नाम जप साप्ताहिकी शुरू की। गांववासी और साधक अपनी अपनी पारी अनुसार जाप करते। अक्षय तृतीया पर स्थापना के बाद साप्ताहिकी की पूर्णाहुति करके यज्ञ व महाप्रसाद का आयोजन तय किया गया। गरमी के दिन, प्रचण्ड ताप, सारे कुएं और हेण्डपंप सूख गए थे। कुओं में उतर कर आधा घण्टे में बस एक कटोरा पानी एकत्र किया जा सके ऐसी ही स्थिती थी। ऐसी दशा में सैकड़ों भक्तों के लिए पीने के पानी और प्रसाद के लिए जल का प्रबंध कैसे होगा? मन ही मन गुरुदेव से प्रार्थना की । सद्गुरुदेव की ऐसी कृपा हुई कि एक दिन पहले रात को मूसलधार बारिश हो गई, सभी तालाब, नदी, नाले बह चले। चारों ओर पानी ही पानी हो गया। कुएं तो ऐसे लबालब हुए कि ऊपर खड़े खड़े ही कटोरी से ही पानी ले सकें। प्रचंड़ अंधड़ और वर्षा के कारण दत्त मंदिर के रास्ते की पहाड़ी के पत्थर धसक गए और मंदिर तक जाने का मार्ग अवरुद्ध हो गया। मैं तो रात में वहां जा न सकी। मेरे देवर स्व. शशिकाका किसी तरह वहां गए। गांव के भक्त अखण्ड नाम जप कर रहे थे। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने रातभर जाप को अखण्ड रखा। सुबह जाकर देखा तो मन नाच उठा। सभी को चाय पिलाकर विदा किया।

वर्षा दूसरे दिन भी धीमे धीमे जारी थी। गांव के मोतबिर लोगों ने मुझे कहा- ऐसे मौसम में प्रसाद की पूरियां तलना और हलवा बनना कैसे संभव होगा? मैंने कहा- “आप लोग धर्मशाला पहुँचो, गुरुदेव बारिश को रोक रखेंगे।” पांच ही मिनट बीते होंगे कि आसमान साफ़ होकर धूप निकल आई। प्रसाद का आयोजन बिना किसी विघ्न के संपन्न हो गया। इसी समय शोभायात्रा निकाल करके मूर्तियों की स्थापना भी संपन्न हुई।

प्रसाद का हलवा बनाने के लिए शुद्ध घी की जरूरत थी। मेरे पिताजी कभी वनस्पति घी नहीं खाते थे अत: उन्होंने पहले ही कह दिया था-ताई घी बढ़ियावाला ही लेना । पैसों की तंगी के मैंने तो प्रसादी के लिए वनस्पति घी ही मंगवाया था। इधर मेरे मौसाजी श्री. पुरुषोत्तम पाण्डे को एक थैली में सिक्के भरकर दायित्व सौंपा गया कि भोजन के लिए पंगत बैठने पर प्रत्येक वयस्क व्यक्ति को एक-एक सिक्का दक्षिणास्वरूप भेंट करना है। प्रसादी समाप्त होने पर मौसाजी ने थैली लौटाई तो वह वैसी की वैसी ही भरी थी। मैंने कहा-मौसाजी, क्या दक्षिणा देना भूल गए? मौसाजी बोले- “ताई तुमने न जाने कैसी चमत्कारी थैली दी जिसमें पैसे कम ही नहीं होते। मैंने तो बड़ों के अलावा छोटों को भी दक्षिणा दी पर सिक्के अभी भी उतने ही हैं।” इतना कह कर वे थैली लौटा गए। इधर जो भी प्रसादी लेकर उठता यही कहता- “ताई हलवे के लिए कौनसा घी वापरा है? बड़ी प्यारी महक है, स्वाद भी लाजवाब है। जीवन में पहली बार ऐसे घी का स्वाद चखा है।” स्वयं मेरे पिताजी ने कहा- ताई मेरे लिए भी २-३ किलो घी अलग से मंगवा देना।

आखिरी पंगत लगी तो घरवाले मुझे बुलाने आए और आग्रह किया कि हम सभी साथ साथ ही प्रसाद ग्रहण करें। मैंने कहा- आप लोग पहले बैठ जाओ, मैं अंत में बैठूंगी। मेरे सामने थाली आते ही भोले बाबा समझेंगे कि अब काम पूरा हो गया तो फ़िर से बारिश चालू हो जाएगी। हुआ भी यहीं, मैंने अंत में ज्योंही पहला कौर लिया और उधर बारिश चालू हो गई। कार्यक्रम समाप्ति पर हम सभी घर लौट आये। रात्रि में ठीक ९ बजे घर के द्वार पर तीन बालक जिनकी उम्र क्रमश: ७,९ व १२ वर्ष रही होगी, भिक्षा के लिए आए। उन्होंने ’ॐ भवति भिक्षां देहि।’ की टेर लगाई। समाचार मिलने पर मैंने अपने सासूजी से कहा तीनों को अलग भिक्षा देनी होगी। बाहर आकर देखा तो उन बालकों के मुखमंडल दैदीप्यमान थे । ऐसे सुन्दर सलौने बालक इस क्षेत्र के तो नहीं लगते। ज्योंहि भिक्षा ली वे लौट पड़े। क्षणभर बाद देखा तो वहां कोई नहीं था। तीनों ही आदृश्य हो गए। उसी क्षण मुझे चार दिन पहले देखा हुआ सपना स्मरण हो आया। सपने में मैं ऊपर के कक्ष में लेटी हुई थी कि तीन बालक आए और पुकार लगाई- ’आम्हाला जेवण मिळेल का?’ (हमें भोजन  मिलेगा क्या?) मैं झट से उठी और उनके लिए तीन पाट लगाकर जो भी बचा हुआ भोजन घर में उपलब्ध था उन्हें परोसा। भोजन के अंत में बीच में बैठे बालक ने दोनों ओर बैठे बालकों की ओर एक-एक कर देखा और कहा-’हमें चावल, दूध और दही मिलेगा क्या?’ महाराष्ट्र में भोजन के अंत में चावल, दूध और दही मिला कर खाने का रिवाज है। मुझे अपनी भूल का अफ़सोस हुआ और क्षमा मांगकर मैं नीचे रसोई की तरफ़ दौड़ी। चावल, दूध और दही लाकर परोसा। उन बालकों ने बड़े चाव से ग्रहण किया। भोजन समाप्त होते ही तीनों बालक पाट पर खड़े हो गए और मुसकराते हुए अदृश्य हो गए। इसी क्षण मेरा स्वप्न भी भंग हो गया। आज ४ दिन बाद वही स्वप्न साकार रूप में देखा तो मेरे आनन्द की कोई सीमा नहीं रही।

दत्त मंदिर के निर्माण के साथ ही ऐसी कई अलौकिक और अद्भुत घटनाओं की शृंखला की शुरूआत हुई। हर काम से पहले मुझे सद्गुरुदेव की ओर से संकेत मिलना प्रारंभ हो गए। हर नये काम, हर प्रवास, हर निर्णय से पहले मेरा स्वभाव बन गया कि मैं सद्गुरुदेव से आज्ञा लेकर ही उसे करती। जब तक आज्ञा नहीं मिलती चाहे कुछ भी हो मैं कार्य नहीं करती। फ़िर तो सद्गुरुदेव की इतनी कृपा बरसी की मन में कोई भी भाव आता तो वह शीघ्र ही पूर्ण हो जाता। इसीलिए मैं बार-बार, हर क्षण  यही कहती हूँ कि ‘सद्गुरु कृपा हि केवलम्।’ ….आपकी अपनी ‘बा’.

पूर्वप्रसिद्धी शिवप्रवाह ऑगस्ट २००८.

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