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पहला दत्तयज्ञ

19 नवम्बर

ईंटालीखेड़ा गाँव (शिवपुरी) में भगवान श्री दत्तात्रेय की मूर्ति स्थापना के पश्चात दिसम्बर माह में दत्तात्रेय जयंती का पर्व आया। उन दिनों हमारा पूरा परिवार अधिकांश समय गिरगाँव-मुम्बई में ही रहता था। गाँव के मकान में हम चारों देवरानी-जेठानी में दो-दो बारी-बारी से रहते थे। उस समय मेरे देवरानी गीता काकी गाँव में ही रह रही थी। दत्त जयंती के उपलक्ष्य मैंने दत्तयज्ञ करवाने का संकल्प लिया। गिरगाँव में फ़ड़केवाड़ी में इस अनुष्ठान हेतु मंगल कार्यालय किराये पर लिया। पंडित-पुजारी से सम्पर्क कर हवन हेतु आवश्यक सामग्री एकत्र करने लगे। ढाई बोरी तिल, ढाई बोरी जव और १६ टीन घी का हवन में उपयोग होना था। पूजा हेतु स्वर्णनिर्मित शिवजी एवं मंगलसूत्र इत्यादि सामग्री भी लानी थी। पास में पैसे तो थे नहीं । मैंने मेरे गहनों को एक जोहरी के यहाँ गिरवी रख कर पैसों का इंतजाम किया था। गाँव से करीब ६० परिजन गिरगाँव पहुँचे। उस दिन हवन में करीब ४००-५००  अतिथि और भक्त भी सम्मिलित हुए।

दत्त जयंती के दिन प्रात: ६ बजे मैं ध्यान में बैठने से पहले मैंने अपनी माँ से कहा कि मैं ईंटालीखेड़ा जा रही हूँ। माँ चौक गई और कहने लगी,”ताई क्या बात कर रही हो? यहाँ सारे मेहमान आये हुए हैं, यज्ञ की तैयारी हो चुकी है और तुम गाँव जाने की कैसे सोच सकती हो?” मैं तो बस कह कर ध्यान में बैठ गई। उस दिन करीब डेढ़ घंटा ध्यान लगा। ध्यान में मुझे ईंटालीखेड़ा का दत्त मंदिर व ससुराल का मकान दिखा। पूरा समय ऐसा लगा जैसे मैं वहां पहली मंजिल की खिड़की (गोखड़ा) जो मेरी पसंदीदा जगह है, वहीं ध्यान में बैठी हूँ। ध्यान से उठी तो पुन: स्वयं को गिरगाँव में ही पाया। उस दिन ध्यान के पश्चात सारे शरीर में रोमांच का अनुभव हो रहा था। भीतर ही भीतर आनन्दित हो रही थी और किसी घटना का आभास भी हो रहा था।

बाद में हम सभी मंगल कार्यालय पहुँचे। दत्तयज्ञ आरंभ हुआ। मैंने पास बैठे सभी व्यक्तियों से कहा कि यज्ञ की अग्नि में साक्षात शिवजी के दर्शन होंगे, सभी ध्यान रखना। यज्ञ  की पूर्णाहुति के कुछ क्षण पूर्व ही मुझे उस यज्ञाग्नि में शिवजी के कमर के ऊपर का हिस्सा अग्नि की लपटों में स्पष्ट दिखायी दे रहा था। उसी क्षण मेरे ऊपर गेंदे के फ़ूलों की पंखुडियों की वृष्टि हुई जो सभी ने देखी। मैंने ऊपर की ओर देखा कि शायद सजावट से कोई फ़ूल गिर गये हों किंतु मेरे ऊपर और आसपास ऐसा कुछ नहीं था। मेरे बगल में बैठे नारायण मामा तो बोल ही उठे कि उधर आपपर तो पुष्पवृष्टि हो रही है और इधर हम कोरे के कोरे बैठे हैं। पूजन के पश्चात सभी ने महाप्रसाद ग्रहण किया।

दत्तजयन्ती के १५ दिन पश्चात गाँव से देवरानी गीता का पत्र आया। उन दिनों टेलीफ़ोन की सुविधा तो थी नहीं। पत्र में गाँव में दत्तजयन्ती के दिन घटित दो चमत्कारों का विवरण था। दत्तजयन्ती की सुबह करीब ७-७.३०  बजे गीता काकी घर की छत पर स्थित कक्ष में बाल संवारने गई तो उसने देखा कि उस गोखड़े में जहाँ मैं हमेशा ध्यान करती थी वहाँ दो कुमकुम के पगले और उसके आगे नीचे फ़र्श पर ९ कुमकुम के बड़े आकार के पगलों के निशान थे। पगले गोखड़े से सामने वाली दीवार की ओर तक थे। वहाँ एक आलिये में गुरुदेव की तस्वीर रखी थी। तस्वीर के सामने एक ६ इंच का बड़ा दुर्लभ शंख प्रकट हुआ था। शंख ताजे पानी से भरा था और उस पर तुलसी पत्र भी धरा हुआ था। वो यह देख कर डर गई। उसने पड़ोसियों को बुलाया। सभी ने आकर उस निशानों को देखा। किसी ने शंका जताई कि कहीं गीता काकी ने ही तो ये निशान नहीं बनाए हैं पर गीरा काकी के पैरों के निशान इतने बड़े कहाँ थे?

धीरे-धीरे पूरे गाँव में बात फ़ैल गई और दर्शिनार्थियों का तांता लग गया। भक्तों की भारी भीड़ हो गई जिसे नियन्त्रित करने के लिए तीन दिन तक पुलिस को आना पड़ा। आसपास के गाँवों में भी बात फ़ैली। यह बात सेरिया की संत श्रीतुलस्या माताजी ने सुनी तो वे भी वहां पहुँचीं। उन्होंने काफ़ी समय तक पगलों का निरीक्षण किया और कुमकुम भरा थाल मंगवाया। उन पगलों के पास कुमकुम से भरा अपना पैर रखा, निशान बनाया। फ़िर दोनों निशानों का निरीक्षण किया तो कहा- ये पगले तो सचमुच भगवान के ही है।

दत्तात्रेय जयन्ती की रात्रि को दत्त मंदिर में एक अद्भुत घटना और घटी। मंदिर के सामने रास्ते में हमेशा की तरह कई पटेल (काश्तकार) चारपाइयों पर सो रहे थे। अचानक किसी की नजर दत्त मंदिर की ओर से आ रही रोशनी पर पड़ी। उन दिनों गाँव में बिजली तो थी नहीं। उसने सोचा कि कोई भूत तो नहीं? मंदिर के इर्द-गिर्द दो प्रकाश के गोले घूम रहे थे। सभी लोग मंदिर के सामने आ खड़े हुए। भय के कारण किसी ने मंदिर में प्रवेश नहीं किया। करीब ५ मिनट तक वह दिव्य प्रकाश मंदिर के गर्भगृह में रहा फ़िर लुप्त हो गया। सभी आश्चर्य में पड़ गए। इन दोनों घटनाऒं से हम अछूते रहे किंतु जानकर बहुत खुशी हुई। उस दिन ध्यान में दिखे दृश्य का संदर्भ अब ठीक समझ में आ गया। आज भी वह अलौकिक शंख शिवपुरी के दत्त मंदिर में रखा हुआ है। स्थापना से ही दत्त मंदिर में इस तरह के चमत्कारों की शृंखला जारी रही। सद्गुरु की महिमा और कृपाप्रसाद की कोई सीमा नहीं है।…प्रभु बा.

पूर्वप्रसिद्धी- सप्टॆंबर २००८ शिवप्रवाह

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2 responses to “पहला दत्तयज्ञ

  1. Hitoo

    दिसम्बर 4, 2011 at 2:06 अपराह्न

    II Gurukrupa II Payo ji Maine Ram Ratan Dhan Payo……Jai Shri Krishna

     
  2. Manish

    नवम्बर 20, 2011 at 8:12 पूर्वाह्न

    अद्भुत!!! विश्वास पर विश्वास करना मस्तिष्क का काम नही होता, वह तो अनुभूति है जो मस्तिष्क को सूचना देती है.

    मैं भी विचारों से आस्तिक हूँ, लेकिन कभी खुद को समझ नही पाया… फिर प्रभु की ‘माया’ समझ पाना कैसे सम्भव है?

     

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