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मेरे सद्गुरु : मेरे शिव- श्री. वरदीचन्द राव

16 फरवरी

मेरे सद्गुरु : मेरे शिव!
आपको पाने के लिए
हम शैलबाला सी अखण्ड साधना कहां से लाएं?
प्यारे शंभु, नंदीश्वर बन कर
द्वार पर बैठ जाने का धीरज कैसे जुटाएं?
हमें तो बस यह बता दो कि
वह कौनसा जतन है जिससे
जनम जनम तुम्हारे हो जाएं ।

मेरे सद्गुरु : मेरे शिव!
लोग कहते हैं कि आप कैलास में विचरते हैं,
पर मैं जानता हूं कि आप
आप कहीं भी विचरें
विश्राम तो साधक के दिल में ही करते हैं ।
हमें तो बस यह बता दो कि
साधक अपने दिलों में झांककर
आपका दीदार कैसे पाएं?

मेरे सद्गुरु : मेरे शिव!
सत्संग में सभी भक्त गाते हैं,
संग संग आप भी गुनगुनाते हैं ।
पर भजनों के सुरों पर सवार होकर
आप न जाने कहां पहुंच जाते हैं?
हमें तो बस इतना बता दो कि
आपके साथ-साथ हम भी कैसे दौड़ लगाएं?

मेरे सद्गुरु : मेरे शिव!
आपने अंगुलि पकड़कर चलना सिखाया,
आपने संकेतों से परम्परा का सूरज दिखाया,
पर मेरे भोले बाबा!
हमें तो बस इतना बता दो कि
इन पैरों में चलने का बल
और आंखों में दृष्टि कैसे जुटाएं?

मेरे सद्गुरु : मेरे शिव!
सही बता दूं, आपके चरणों में प्यार पाया है,
आपके स्वरूप को भस्म सा रमाया है ।
अब न तो स्वर्ग लुभाता है
न मोक्ष भाता है ।
बस यह अनुमति दे दें कि
इन चरणों को छोड़कर कहीं नहीं जाएं ।

( श्री. वरदीचन्द राव द्वारा कोटा में महाशिवरात्रि पर्व पर प्रस्तुत कविता)

पूर्वप्रसिद्धी- शिवप्रवाह मार्च 2011.

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