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सद्गुरु का आभार

18 मई

अपनी बात

कभी गुरु श्रीकृष्ण ने अपने सखा-शिष्य अर्जुन से कहा था- ’संभवामि युगे युगे।’ सचमुच हर सद्गुरु अपने शिष्यों के तारणार्थ, उनके उन्नयनार्थ हर युग में आते रहे हैं। यह बात अलग है कि शिष्य सद्गुरु को नहीं पहचान पाता परंतु सद्गुरु उसे ढूंढ़ ही लेते हैं। यही सद्गुरु का कमाल है। सद्गुरु न केवल खोज करते हैं वरन् शिष्य में पूरी पात्रता भी भर देते हैं। जन्म-जन्मांतरों का यह संबंध बड़ा ही अद्भुत् है। एक ऐसे ही सद्गुरु ने हमें फ़िर अपन स्व-स्मरण कराया है। इनके प्राकट्य दिवस पर संकल्प लें कि हम उनकी कसौटी पर खरे उतर पाएं। यही हमारे लिए सच्चा संकल्प दिवस होगा, यही सद्गुरु का आभार होगा। —वरदीचन्द राव.
पूर्वप्रसिद्धी- एप्रिल 2011 शिवप्रवाह.

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