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शक्तिपात साधना की महादेवी: प्रभु बा : श्री. विनय त्रिवेदी.

21 मई

‘प.पू. परमहंस स्वामी सुगंधेश्वरानंदजी राजयोगी प्रभु बा’ वर्तमान में एक ऐसे सद्गुरु हैं, जिन्होंने ‘साकार’ और ‘निराकार’ भक्ति का अपूर्व संगम सृजित किया है। ‘कर्मकाण्डों’ से लेकर ‘ब्रह्मानंद’ तक की यात्रा उनके सान्निध्य और निर्देशन में वर्तमान में जारी है। इस मार्ग को अनूठा रूप देकर आपने हजारों साधकों को जीवन की अन्यतम ऊंचाइयां पाने में पूरा आशीर्वाद प्रदान किया है। आपका मार्ग अनेक परम्पराओं का सम्मिश्रण होते हुए भी अपनी अलग पहचान रखता है। इस मार्ग में प्रचलित कतिपय परम्पराओं व शब्दावली का सामान्यसा परिचय यहां प्रस्तुत है:-

कुण्डलिनी शक्ति:

हमारे शरीर में जो ईश्वरीय शक्ति है, उसे ‘कुण्डलिनी शक्ति’ कहते है। उसे हम माँ कह कर पुकारते है। यह बाल से भी पतली, केसरिया रंग की और करीब साढ़े तीन इंच लंबी होती है। उसके दो मुख है। एक सांसारिक तो दूसरा आध्यात्मिक। सांसारिक मुख खुला है, तो आध्यात्मिक मुख बंद है। वह केवल ‘गुरुकृपा’ से ही खुलता है। वैसे तो हठ विद्या से कुण्डलिनी शक्ति का जागरण हो सकता है, लेकिन उसमें शारीरिक कष्ट अधिक है। उचित तो यही है की सद्गुरुकृपा से कुण्डलिनी जाग्रत हो। फ़िर हमें सिर्फ़ सद्गुरु की तरफ़ देखना है। सर्वस्व सद्गुरु को समर्पित करने से सद्गुरु ही सब संभालते है, हमें कुछ नहीं करना पड़ता है।

हम ‘शक्ति’ के पुजारी है। कुण्डलिनी ही  माँ जगदम्बा है, शक्ति है। हम उसी की पूजा करते है। ध्यान से हम शक्ति को शिव से मिलाने का प्रयास करते है।

शिव जिसका दिन-रात चिन्तन  करते है, वही चित्ती शक्ति है, वही महामाया है। वह केसरिया रंग की जैसे कुमकुम में भिगोई हुई हो। वह कुण्डल की तरह गोल बैठी हुई है इसलिए उसे कुण्डलिनी कहते हैं। चित्ती शक्ति का अर्थ है चित्त को हिलाने वाली। वह अपने चित्त के सूक्ष्मतम कण को भी हिलाने-डुबाने वाली है। चित्त को स्थिर कर एकाग्र करने वाली है। अपने शरीर की सारी गतिविधियों को तीव्रता देने वाली है। शरीर के भीतर उसी की सत्ता है।

कहते है कि स्वभाव नहीं बदलता है, परन्तु कुण्डलिनी शक्ति हमारे चित्त में प्रवेश कर उसका स्वभाव ही बदल देती है। शक्ति का कार्य है हमारे दुर्गुण को सगुण में बदलना। हमें पापों से मुक्ति दिला कर हमारा शुद्धीकरण करना। यह हमारे अंदर ऊर्जा का निर्माण करती है और हमारी हर इच्छा को पूर्ण करती है। शक्ति लहराते हुए शिव से मिलने को आतुर रहती है।

शरीर में मल एवं मूत्र त्यागने की जगह के मध्य छोटी से जगह होती है, वहीं कुण्डलिनी का मूल निवास स्थान है। शक्तिपात होते ही वह प्रज्वलित अग्नि की तरह मूलाधार में विराजमान होती है। इसी क्षण उसका दूसरा मुख अर्थात आध्यात्मिक मुख खुलता है। सद्गुरुकृपा से शक्ति जाग्रत होते ही वह सुषुम्ना नाड़ी में कार्यशील होती है। हमारे शरीर में ७२ हजार नाड़ियॉं हैं, जिसमें ईड़ा, पिंगला और सुषुम्ना मुख्य है। सुषुम्ना नाड़ी भीतर से खोखली होती है। शक्ति इसी नाड़ी में कार्यशील होती है। वह नदी की धारा के जैसे कमल भेदन करते हुए हॅंसती, खेलती, खिलखिलाती, लहराती हुई शिव से मिलने के लिए आतुर होती है। जाग्रत होने के पश्चात् वह शांत नहीं बैठ सकती। वह शिव से मिलने का अपना सम्पूर्ण प्रयास करती है।

इसके जाग्रत होते ही हजारों सूर्य का दर्शन होने लगता है, नीलबिन्दु दिखने लगता है, अनहद नाद सुनाई देने लगता है। इसके जगते ही ज्वाला उठती है, फ़ूत्कार उठती हैं, हम हॅंसते रहें, डोलते रहें, घूमते रहें और शादी की शहनाइयां बजें, मंगल गान हो, इसके लिए माँ सज-धज कर शिव के मिलन में मग्न होती है।

शक्तिपात दीक्षा

शक्तिपात दीक्षा में समर्थ सद्गुरु अपनी शक्ति द्वारा शिष्य पर मंत्र शक्ति का प्रहार उसके अंतरंग में निहित सुप्तशक्ति को जाग्रत कर चलायमान कर देते हैं। केवल समर्थ सद्गुरु ही इसमें समर्थ हो सकते हैं, अन्य कोई नहीं। वर्तमान में इस धरा पर कुछेक सद्गुरु ही उपलब्ध हैं, जिनमें से अधिकतर तो हिमालय की गुफ़ाओं या अन्य कन्दराओं व गुप्त स्थानों पर जन जीवन से दूर अपनी साधनाओं में रत हैं। इस कारण शक्तिपात दीक्षा प्राय: दुर्लभ  है जबकि वर्तमान कलयुग में इसकी अत्यन्त आवश्यकता है। जैसे तैंतीस कोटि भगवानों की पूजा नारायण को ही मिलती है, वैसे ही सारी साधनाएं शक्तिपात में मिलती है। ’प्रभु बा’ का कहना है- ’दस जगह भटकने की आवश्यकता नहीं। सिर्फ़ दो घंटे ध्यान करो और सद्गुरु ने जो नाम मंत्र दिया है, उसका स्मरण करो, क्योंकि यही ध्यान का आधार है। ध्यान करो और अपनी अन्त:प्रेरणा से अंतस्थ ईश्वर को जान लो।’

कितनी सरल, संक्षिप्त पर पूर्ण व्याख्या है यह शक्तिपात दीक्षा की। अगर इसके एक-एक अक्षर और वाक्य की विवेचना की जावे तो एक पूर्ण ग्रंथ बन सकता है। परन्तु सद्गुरु ’प्रभु बा’ ने इसे ’गागर में सागर’ की भांति मुमुक्षुओं के कल्याण हेतु कहा है। चाहे वह शक्ति मार्ग, योग, क्रिया योग, हठ योग, सुदर्शन क्रिया, खेचरी, पूजा-पाठ, स्पर्श विद्या या अन्य कोई भी मार्ग अपनाया जाय, वह केवल सुप्त कुंडलिनी शक्ति के जागरण का मार्ग है और इन विधियों में व्यक्ति विशेष की पृष्ठभूमि के आधार पर बहुत समय और साधना लगती है, तब कहीं जाकर शक्ति जाग्रत हो सघन साधना से ऊर्ध्वगति में चलायमान होती है। इस सब समय एवं परिश्रम को लांघ कर समर्थ सद्गुरु अपनी शक्ति के द्वारा मुमुक्षु के अंतरंग में निहित शक्ति को जाग्रत कर देते हैं। ’प्रभु बा’ शक्तिपात दीक्षा की मेरुदंड हैं और उन्हें प्रवचनों और ज्ञान प्रदर्शन की बजाय स्वाध्याय से प्राप्त स्वयं अनुभव पर ही विश्चास है। आपका स्वयं का अनुभव ही आपके विश्वास का ठोस आधार है, जिसे कोई भी बड़ा से बड़ा तर्क विचलित नहीं कर सकता। इसी कारण वे अपने समस्त साधकों को राय देती है कि आप केवल एक घंटा सुबह, एक घंटा शाम को नियमित ध्यान करें और अनवरत ध्यान से अनुभव प्राप्त करें यह आपको उन्नति के मार्ग पर स्वयं ले जायेगा। इनका स्पष्ट कथन है कि दीक्षा के पश्चात् नियमित ध्यान और नामस्मरण आपको शिव के दर्शन नहीं परन्तु शिव के पद पर प्रतिष्ठित कर देगा इसमें कोई संदेह नहीं है। इनका मार्ग बिलकुल सीधा-साधा प्रपंचरहित आध्यात्मिक उन्नति का है। ना कोई आडम्बर ना व्यर्थ व्यय। यह पूर्ण अध्यात्म का मार्ग है, इसमें धन, समाज, गृहस्थी, धर्म, मत आदि कोई भी व्यवधान नहीं है। यह सबको सुलभ है चाहे वह नर हो या नारी।

सद्गुरु ’प्रभु बा’ की शक्तिपात दीक्षा का उद्देश्य सांसारिक के साथ-साथ आध्यात्मिक प्रगति करना है। दर्शन पर विश्वास है, प्रदर्शन पर नहीं। धर्म का परिवर्तन नहीं, कर्म का परिवर्तन है। यह एक ऐसा योग है जिसमें जीवन का लक्ष्य प्राप्त होकर प्रभु से मिलन होता है। यह एक राजयोग है इसमें पलायनवृत्ति नहीं हैं। सांसारिकता में आध्यात्मिकता का सम्मिलन है। नाम, जप, सत्संग एवं ध्यान साधना की दीक्षा के उपरांत साधक की आत्मबोध उन्नति में शक्तिपात तीव्रता प्रदान करता है। आज के निराशापूर्ण संसार में अध्यात्म ही शांति का प्राकट्य करने में समर्थ है। इस जनकल्याण के भाव से ही सद्गुरु अपनी शक्ति का उपयोग शक्तिपात दीक्षा में कर रहे हैं। मानव कल्याण के लिए एवं साधकों की सुलभता के लिए ही ’प्रभु बा’ ने अनेक आध्यात्मिक केन्द्र स्थापित किए हैं। आपका मानना है कि प्रभु दर्शन के लिए विशिष्ट दृष्टि चाहिए तो शक्तिपात से प्राप्त होती है। ईश्वर दर्शन से पूर्व उनके अस्तित्व का आभास होता है। जिसप्रकार अदृश्य वायु का अनुभव होता है। अदृश्य होने पर भी कोई  इसे नकार नहीं सकता। ऐसे ही ईश्वरीय सत्ता है। जैसे पानी का कोई आकार नहीं होता, पर वह होता है; ठीक वैसे ही परमात्मा भी निराकार है। हमें उसे देख सकने की दिव्यज्योति व पहचान सकने की ज्ञानाग्नि का विकास करना होगा, जो शक्तिपात से सहज होती है।

आज के युग में ईश्वर सद्गुरु के रूप में आता है ताकि वे समयानुकूल उपदेश ज्ञान बता सकें। सद्गुरु के बाहरी कलेवर को नहीं उनकी भीतरी शक्तियों को पहचानना है। उनका लक्ष्य सर्वजनहिताय होता है। शक्तिपात दीक्षा से अंतर्निहित सुप्त कुण्डलिनी शक्ति का जागरण कर उसे उर्ध्वमुखी बनाया जाता है। सद्गुरु के मंत्र के प्रभाव से ध्यान-साधना के जरिये अंतर्ज्ञान व चेतना को जाग्रत करते हुए ज्ञानाग्नि को उत्तरोत्तर तीव्र कर समस्त आशंकाऒं, भ्रमों, अज्ञानताओं को भस्म कर अपने सद्गुरु में निहित ईश्वर के दर्शन का सुयोग बनता है। ध्यान की उन्नति से आत्मदर्शन होता है। आत्मा ही परमात्मा है। सद्शिष्य के अंतर में सद्गुरुरुपी चिंतामणि को पहचानना ही परम् ज्ञान है। यही शक्तिपात का उद्देश्य भी है।

आश्रम परम्परा :

’प्रभु बा’ के जीवन का एक ही लक्ष्य है कि ’जीव को शिव’ और ’नर को नारायण’ बनाना। ’प्रभु बा’ के जीवन का हर क्षण, उनका उठा हुआ हर कदम निरन्तर इसी लक्ष्य को साधने की ओर बढ़ता है। ध्यान, सत्संग और अखण्ड नामजप ये तीन वरदान लेकर वे गाँव-शहर भ्रमण करते हुए सोये हुए मनुष्यों को जगाने का प्रयास कर रहे हैं। अपने मधुर स्वभाव व प्रेममयी वाणी से सभी में प्रेमभाव जाग्रत कर ईर्ष्या, द्वेष, राग, वैमनस्य जैसी दुष्प्रवृत्तियों को दूर कर सभी के हृदय में ममता, करुणा और ईश्वर के प्रति प्रेम का प्रस्फ़ुटन कर रहे हैं।

’प्रभु बा’ का मानना है कि बड़े-बड़े उपदेशों की अपेक्षा निरंतर ईश्वर जप से स्वत: ही स्वयं में सात्त्विक भाव जाग्रत होकर परिवर्तन की लहरें उठने लगेंगी। अपने गुण-दोषों का विश्लेषण कर फ़िर उपाय करने से बेहतर है कि स्वयं को भगवत् जाप के मानसरोवर में डुबोएं, सारे दोष स्वत: ही धुल जाएंगे। इस मानसरोवर में यदि कौआ भी डुबकी लगाए तो वह हंस बन जाता है। ’प्रभु बा’ के अनुसार साधक को तारने वाली अलौकिक शक्ति ईश्वर के नाम और सद्गुरु मंत्र में है न किसी मानव विशेष में। इसलिए सबसे सुलभ और श्रेष्ठ साधन है ध्यान और संकीर्तन । ध्यान और साधना तो आत्मा का स्नान है।

गत कुछ वर्षों से यही संदेश देने हेतु ’प्रभु बा’ ने राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल और दिल्ली आदि राज्यों में कई जगह भ्रमण किया और उनके सान्निध्य में छोटे-छोटे आदिवासी गाँवों व यहाँ तक की नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में भी ५०  अखण्ड साप्ताहिकियों, नाम जप, सत्संग आदि के कार्यक्रम आयोजित हुए है। जहाँ गरीब वस्तियों, जंगलों और अनपढ़ लोगों के मध्य सरस भजनों के गान के साथ ही ’ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र की स्वर लहरियों से वातावरण ईश्वरीय हो गया। वहीं इन साप्ताहिकियों में साधकों द्वारा अखण्ड जप, सामूहिक ध्यान, मंगल आरती, गुरु-गीता पाठ, शिवमहिम्न स्तोत्र का नियमित पाठ किया गया। साप्ताहिकियों के दौरान रोजाना अन्नक्षेत्र अर्थात् भोजन प्रसाद एवं पूर्णाहुति के दिन महाप्रसाद के रूप में कई साधकों ने ’प्रभु बा’ के आशीर्वाद प्राप्त किया। सैंकड़ों लोगों ने ’प्रभु बा’ के आशीर्वाद से शक्तिपात दीक्षा लेकन अपने जीवन को नई दिशा दी और अपने आध्यात्मिक और सांसारिक जीवन को नई दिशा दी और अपने आध्यात्मिक और सांसारिक जीवन की समस्याओंका उचित मार्गदर्शन प्राप्त किया है। इस तरह निर्मित ’प्रभु बा’ के वासुदेव कुटुम्ब का हर साधक भगवत् नाम और गुरुमंत्र की मशाल लेकर जाति-संप्रदायों से ऊपर उठ समाज में एक नये मानव धर्म की आध्यात्मिक क्रांति धरती पर ला रहा है और ’प्रभु बा’ के संदेश को जन-जन में संचरित कर रहा है।

इन वर्षों में कई जोड़ों के विवाह, बटुकों के उपनयन संस्कार, नवजात शिशुओं के नामकरण, अन्नप्राशन संस्कार, साधकों के गृहप्रवेश, देवालयों में मूर्ति एवं कलश की स्थापना जैसे मंगल कार्य प्रभु बा के आशीर्वाद से उनके सान्निध्य में सम्पन्न हुए।

’प्रभु बा’ के साधकों द्वारा पूर्ण हर्षोल्लास के साथ गुरुपौर्णिमा, दत्त जयंती, महाशिवरात्रि, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, नवरात्र, रामनवमी, अक्षय्यतृतीया, पार्थेश्वर पूजा, प.पू. प्रभु बा का ‘जन्म दिवस’ एवं ‘दीक्षा दिवस’ आदि मनाये जाते है। सभी साधकों द्वारा सामूहिक रूप से ध्यान, भजन, चक्रीय सत्संग, शिव-अभिषेक आदि किये जाते है। साथ ही साधकों के व्यक्तित्त्व विकास व कला प्रोत्साहनार्थ कीर्तन, रंगोली स्पर्धा, भजन संध्या और अनुभव कथन जैसे आयोजन भी होते रहते है।

शारदीय नवरात्र इस आश्रम का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण उत्सव होता है। ’प्रभु बा’  का मार्ग शक्ति की पूजा है और नवरात्र शक्ति का ही पर्व है। साधकों के कल्याण हेतु अखण्ड दीप प्रज्वलित किये जाते हैं। हरसिद्धि अम्बाजी का शृंगार प.पू. प्रभु बा स्वयं करते हैं। नौ रात्रियों तक गरबा रास होता है। रात भर सभी साधक गरबा खेल कर माँ जगदम्बे की आराधना की मस्ती में झूमते रहते हैं। नौ दिनों तक देवी का कुंकुमार्चन नवाह्न मंत्रों के साथ होता है। सहस्राधिक ज्योति-कलश पूरी नवरात्रि के दौरान प्रज्वलित रहते हैं। उस दिन सभी भक्तों को विशेष प्रसाद भी वितरित किया जाता है। दशहरे के दिन हवन कर उत्सव की पूर्णाहुति की जाती है। रात्रि को काम, क्रोध, ईर्ष्या, और द्वेष जैसे अवगुणों के प्रतीक रावण का दहन किया जाता है। आश्रम में विभिन्न अवसरों पर भागवत् कथा, रामायण पाठ आदि का भी आयोजन किया जाता है।

इन सभी के अलावा आश्रम ट्रस्ट द्वारा अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन भी भली भांति किया जा रहा है। आश्रम परिसर एवं आसपास के क्षेत्र में बंजर और पहाड़ी क्षेत्र को हरी चादर ओढ़ाने के लिए अपने स्तर पर ही वृक्षारोपण का कार्य किया जा रहा है जो निरन्तर प्रगति पर है। जल संरक्षण जैसे मूलभूत कार्य का बीड़ा स्वयं ’प्रभु बा’  ने उठाया है। स्थानीय गाँव के तालाब को हाल ही में गहरा कर उसकी पाल का निर्माण कार्य पूर्ण कराया है जिससे तालाब की भराव क्षमता दुगुनी हो चुकी है।

काशी शिवपुरी आश्रम बेहद पिछड़े आदिवासी और गरीब क्षेत्र में बसा हुआ है जहाँ बीमारियों के ईलाज के लिए लोगों के पास न तो धन है और न ही साधन। अत: यहाँ समय-समय पर विशेषज्ञों द्वारा नि:शुल्क दवाईयाँ भी वितरित की जाती है। आसपास के गाँवों की पाठशालाओं में अंशदान कर शिक्षा के क्षेत्र में आश्रम द्वारा अपना योगदान किया जाकर अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन किया गया।

ग्राम की पुरानी सड़कें जगह-जगह से क्षतिग्रस्त हो चुकी थीं। जिन्हें प्रभु बा के सान्निध्य में पुनर्निमित कर सुलभ आवागमन का साधन बनाया गया। स्थानीय पंचायतों के साथ मिलकर राज्य सरकर की सहायता से बोर वेल खुदाई, हॅन्डपम्प, पक्की सड़कों, नालियों व नहरों का निर्माण कार्य और विद्युतीकरण जैसे विकासात्मक कार्यों को शीघ्रता से सम्पन्न कराने के प्रयास हुए भी है और कई जारी भी है। प्रभु बा द्वारा शिक्षा, संस्कृति, प्रेम, नैतिकता, स्वच्छता, कुप्रथाओं जैसे- दहेज, अंधविश्वास, बाल विवाह, विधवाओं के शापित जीवन आदि के विरोध के संबंध में अपने साधकों को संदेश देकर सांस्कृतिक पुनरोत्थान का भी प्रयास किया जा रहा है।

काशी शिवपुरी आश्रम के परिसर में निम्नांकित मंदिरों की भव्य एवं दिव्य शृंखला है- १. भगवान दत्तात्रेय का मंदिर, २. हरसिद्धि अम्बाजी का मंदिर, ३. द्वादश ज्योतिर्लिंग के मंदिर ४. सद्गुरु मंदिर ५. राधाकृष्ण मंदिर   ६. विठ्ठल रखुमाई मंदिर ७. शिव मंदिर ८. गणपति मंदिर आदि प्रमुख है।

इन सभी साधनाओं का प्रमुख केन्द्र ‘काशी शिवपुरी आश्रम’ है जो राजस्थान के उदयपुर जिले की सलुम्बर तहसील के ईंटालीखेड़ा गाँव में स्थापित है। संयोगवश यह गाँव प्रभु बा का जन्मस्थल भी है। उनका शुभविवाह भी स्थानीय गाँव में ही हुआ है। इसी क्रम में महाराष्ट्र में कल्याण के समीप बदलापुर में भी ’शिव त्रैलोक्य’ आश्रम निर्मित है। एक छोटा आश्रम उदयपुर में ’शिव त्रिशूल’ के नाम से भी संचालित है। ये सभी स्थल शक्तिपीठ के रूप में साधकों के हृदय पर अंकित है। प्रभु बा स्वयं इन्हें ‘सद्गुरु प्रसाद’ मानते हैं। आश्रम से ’शिव-प्रवाह’ मासिकी भी प्रकाशित होती है।

पूर्वप्रसिद्धी-  जागरण जनसेवा मंडल, वागदरी द्वारा प्रकाशित -‘वनवासी अंचल से’ प्रेरणा विशेषांक नव्ह्म्बर २०११.

 अवतार कार्य

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One response to “शक्तिपात साधना की महादेवी: प्रभु बा : श्री. विनय त्रिवेदी.

  1. Hitoo

    जून 1, 2012 at 4:29 अपराह्न

    Sadguru kaliyug mien ek hi sahara hai….. Hum dhanya hai .. P.P.P.Prabhu Baa ke Charankamal mien Sada Sthan Rahein. Jai Shri Krishna…

     

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