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सद्गुरु का प्रसाददान…श्री. वरदीचंद राव.

03 जुलाई

विश्वास की गठरी को लेकर, साधन मार्ग पर प्रशस्त होना।
आस्था के निर्मल नीर से, अपने कल्मषों को धोना।
सद्गुरु सत्ता के प्रकाश से, आलोकित करना मन का हर कोना।
संशय की खरपतवार उखाड़कर, शरणागति के बीज बोना।
इन्हें सद्गुरु-भक्ति के लक्षण कहा जाता है।
इतना साधन करने वाला साधक कहाता है।
किन्तु मेरे सद्गुरु सुंगंधेश्वर,
इस पसायदान से अपने साधक को और ऊपर उठाते हैं।
दिव्य दृष्टिपात से वे निजस्वरूप का दर्शन कराते हैं।
शक्तिपात द्वारा शक्ति का शिव से संयोग कराते हैं।
हरेक साधक को साधना का कनक शैल बनाते हैं।
जिस पर बैठते ही धरती का जुड़ाव समाप्त हो जाता है।
अजूबा तो यह है कि आकाश का भी अंत आ जाता है।
जहॉं चांद, सूरज और तारे टिमटिमाते दीप लगते हैं।
जहां पहुंचे साधक हंस बनकर प्रेम के मोती चुगते हैं।
जहां होता है सद्गुरु व शिष्य का सच्चा मिलाप।
जहां ठहर ही नहीं सकते दैवी, दानवी और मायावी संताप।
जहां तन तरल और मन विरल होकर बाष्पित हो जाता है।
साधक निर्भार होकर सद्गुरुरुपी अम्बर में खो जाता है।
जहां आंखें बंद करो तो दृष्टिगत होते हैं
आनंद, प्रसाद और मोद।
आंखे खोलो तो दिखाई पड़ती हैं सद्गुरु की गोद।
उस दिव्य गोद में बैठा साधक सद्गुरु का ही अंश है।
वह वासुदेव कुटुम्ब का फ़लता-फ़ूलता वंश है।
वह उत्तराधिकारी है परम्परा की अद्भुत विभूति का।
वह हकदार है आध्यात्मिक अनुभूति का।
क्योंकि उसने सद्गुरु से अनुग्रह पाया है।
सद्गुरु ने स्वयं उसे गले लगाया है।
मेरे प्यारे सद्गुरु जन्म-जन्मांतर तक
यह प्यार और ममता लुटाते रहना।
आप तो बस
साधक की पीठ थपथपाते रहना।
आपके इस सम्बल से वह तो निहाल हो जाएगा।
फ़िर देखना
उसका रोम रोम पुलकित होकर
प्रतिपल गुरुपूर्णिमा मनाएगा।
(वरदीचन्द राव द्वारा गुरुपूर्णिमा पर समर्पित)
पूर्वप्रसिद्धी- शिवप्रवाह-जुलाइ अगस्त 2011

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Posted by on जुलाई 3, 2012 in नवीन

 

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