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मानस पूजा- ’बा’ का अनुभव

30 जुलाई

दीक्षा के लगभग ६ माह बाद की घटना है। मेरे पूज्य पिताजी स्व. रामेश्वरजी पाण्डे जो स्वयं सद्गुरुदेव से दीक्षित थे, उन्होंने मुझे मानस पूजा करने का आग्रह किया। यही नहीं उन्होंने मुझे मराठी भाषा की एक पुस्तक ’अनंताकडे झेप’ भी दी। इस पुस्तक में मानस पूजा की विधियां और उसका महात्म्य वर्णित था। उन्होंने कहा कि मानस पूजा करने से शीघ्र ध्यान लग जाता है।
तब से मैं मानस पूजा करती हूँ । मानस-पूजा के दौरान मैं अपनी कल्पना से श्री गुरुदेव की पूजा, अर्चना करती और नैवेद्य भोग लगाती। जैसे-जैसे मेरी कल्पना पंख फ़ड़फ़ड़ाती जाती मेरी मानस-पूजा की विधियां भी विविधता लिये बढ़ती जाती थीं। उस समय प्रतिदिन प्रात: मैं  गुरुदेव को दाल-चावल का भोग अपने हाथों से धराती और खिलाती थी। एक दिन जैसे ही निवाला गुरुदेव के मुँह से लगाया ही था कि अचानक घर में तेज आवाज हुई। मेरी भोग-विधि बाधित हो गई। आँखें खोलीं, जानकारी के लिए जिधर से आवाज आई थी उधर गई। देखा कि पुष्पा काकी (मेरी देवरानी) के हाथ से पानी का घड़ा छूटकर गिर गया था उसी की आवाज थी। मैंने स्वभाववश पूछा- कहीं चोट तो नहीं लगी? और थोडी देर में सबकुछ सामान्य हो गया।

तभी मेरी दृष्टि अपने हाथों की अँगुलियों की ओर गई। उन पर ताजा मेहेंदी लगाई हो ऐसा लग रहा था। स्मरण किया कि मैंने अभी-अभी मेहे्न्दी तो लगाई ही नहीं है। ध्यान से देखा तो पाया कि अँगुलियों पर दाल-चावल लगा है जो सूख गया है। फ़िर ध्यान में आया कि मैं तो मानस-पूजा में अपने गुरुदेव को दाल-चावल का भोग लगा रही थी। मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा पर दु:ख भी भरपूर हुआ, क्योंकि मेरे गुरुदेव को आज भूखा ही रहना होगा। मन कचोट रहा था, पर उपाय कुछ भी नहीं था। दिनभर स्वयं को कोसती रही।

सायंकाल फ़िर ध्यान में बैठी। एकाएक गुरुदेव के दर्शन हुए। मेरे मन में तो अपराध-बोध था ही, मैंने तुरंत क्षमा माँगी। वे बोले- सुगंधा, यह तो होना ही था। हम सुबह-सुबह दाल-चावल नहीं खा पाते, अब से तू ऐसा करना थोड़ा मसालेवाला दूध ही दे दिया करना। यह कह कर वे अंतर्धान हो गए। ध्यान खुलते ही मुझे अपनी नादानी पर खीझ भी आई, कैंसे मैं इतने दिनों तक गुरुदेव को कष्ट देती रही, आखिर उन्हें ही समझाने के लिए आना पड़ा। मैं मानस-पूजा में गुरुदेव की शरीर रूप में कल्पना करती थी अत: उन्हें उसी रूप में आना पड़ता था, इससे उन्हें असुविधा भी होती पर मैं अनजान थी, यह भी गुरुदेव ने ही बाद में ध्यान में बताया।

तब से मैं गुरुदेव को प्रात: की मानस-पूजा में गणेशजी के रूप में अपने मूलाधार में स्थापित करके करती हूँ। दोपहर की पूजा अपने हृदयपटलरूपी कमल में भगवान विष्णु को तथा रात्रि की मानस-पूजा मैं अपने मस्तिष्क में स्थित सहस्रदल स्वर्णकमल में शिव स्वरुप स्थापित कर करती हूँ।

प्रात: उठकर ध्यान में मैं सबसे पहले कैलास मानसरोवर के तट पर पहुँचती हूँ| वहाँ १००८ रुद्राक्ष धारण कर मान सरोवर में तीन बार डूबकी लगाती हूँ | बाहर आते समय एक लोटा जल भरकर ले आती हूँ| स्वयं के शरीर पर भस्म मलती हूँ| पुन: अपने स्थान पर आकर उस जल से अपने पैर धोती हूँ| उन चरणों पर पुष्प चढ़ाती हूँ और नमस्कार करती हूँ| मेरा मानना है कि यह मानव शरीर एक मंदिर ही है और इसी के गर्भगृह अर्थात हृदय में गुरुदेव बिराजमान हैं|

तत्पश्चात शरीर के मूलाधार पर भगवान गणेश के रूप में गुरुदेव को स्थापित करती हूँ, जब वास्तविक पूजा प्रारंभ करती हूँ तो गणेशजी स्थापित ही रहते हैं। राग भोपाली एवं मधुर शहनाई के वादन के साथ-साथ गंगाजल लेकर धीरे धीरे गुरुदेव के चरणों पर छिड़कती हूँ, ताकि गुरुदेव जाग सकें। गुरुदेव जल-प्रक्षालन से उठ बैठते हैं, मैंने उन्हें अपने दोनों हाथों से रत्नजडित बाजोट पर बैठाती हूँ। केला, गंगाजल, आमरस, पंचामृत और मान सरोवर तीर्थ के जल व गुड़ के पानी से गणपति अथर्वशीर्ष के साथ उन पर अभिषेक करती हूँ। गंगोत्री, यमुनोत्री के पावन जल से उन्हें स्नान कराती हूँ, उबटन भी लगाती हूँ। मलमल के अंगवस्त्र से धीरे-धीरे पानी को पोंछती हूँ और उन्हें रत्नजटित सिंहासन पर आरुढ़ करती हूँ। सुवर्ण जरी की किनारी वाला शॉल और कंधों पर उपवस्त्र धारण कराती हूँ, हीना इत्र (ग्रीष्म में खस इत्र), कर्पूर, केशर और चंदन का लेप सारे शरीर पर करती हूँ ताकि उन्हें शीतलता व्यापे। पूज्य गुरुदेव ब्रह्मचारी थे इसलिए उनके चरण्तलों पर हल्दी-कुंकुम लगाती हूँ। उनके शरीर व कंधों पर ३६ प्रकार की अलग अलग वनस्पतियों की पत्तियां चढ़ाती हूँ। उन्हें सहस्रदल कमल अर्पित करती हूँ। विष्णु सहस्रनाम के साथ सहस्र तुलसीदल चढ़ाती हूँ। दूर्वा एवं विविध प्रकार के सुगंधित फ़ूलों को अर्पण करती हूँ, तुलसी मंजरी और कमल के फ़ूलों के हार चढ़ाती हूँ। सिंहासन के चारों और केलपत्र व पुष्पों का मण्डप तना होता है। फ़िर शिवसहस्रनाम के साथ सहस्र बिल्वपत्र समर्पित करती हूँ। आकड़ा, धतूरा, गोकर्ण,केवड़ा, मल्लिका, मदनबाण, स्वर्णाभूषण, हीरे, मोती, पन्ने, आदि अर्पित करती हूँ। चाँदी के लोटे में गंगाजल रखती हूँ। तुलसी पत्र रखकर मसाला-दूध व काजू-बादामयुक्त हलवे का नैवेद्य धरती हूँ। पैसा, सुपारी, स्वर्णमुद्रा आदि दक्षिणा अर्पण करती हूँ, साथ-साथ रिध्दि , सिद्धि और बुद्धि की इसीप्रकार पूजा कर ओटी भरती हूँ। जब प्रसाद ग्रहण होता है तब आँखें बन्द करके पंखा झालती हूँ। मुख से गोविन्दम्, गोविन्दम् की ध्वनि उच्चारित करती हूँ। गुरुदेव आखिरी कौर में मुझे जो प्रसाद देते हैं उसे सहर्ष स्वीकार करती हूँ। उनके थाली में हाथ धोने के पश्चात् रहा तीर्थ व उच्छिष्टान्न का एक-एक कण प्रसाद रूप में पाती हूँ। गुरुदेव को पान-बीड़ा तैयार करके देती हूँ। पीक को भी मैं प्रसादस्वरूप ग्रहण करती हूँ। सवा मण कर्पूर जलाती हूँ। ढोल, नगाड़े, करताल, शजनाई बजते रहते हैं। गुलाल, अबीर उड़ते रहता है, चारों ओर जयघोष होता है। गुरुदेव की सहस्र प्रदक्षिणा करके मैं अपने अपराधों के लिए क्षमायाचना करती हूँ और उनकी स्तुति करती हूँ। उन्हें कोटि-कोटि प्रणाम करती हूँ।

इसीप्रकार दोपहर को पुन: गुरुदेव को दत्त रूप में स्थापित करके अपने हृदय में पूजा करती हूँ। अन्य विधियां वही रहती हैं, यहाँ अन्नपूर्णा की भी पूजा करके उनकी ओटी भरती हूँ। गुरुदेव को पीताम्बर पहनाती हूँ, पंच पक्वानों के नैवेद्य धराती हूँ, आरती करके साष्टांग प्रणिपात करती हूँ। उन्हें रत्नजटित झूले पर बैठाती हूँ, पास में चाँदी की टोकरी में फ़ल, गंगाजल, मेवे व मसाला दूध रखा रहता है। जब गुरुदेव झूले पर बैठ जाते हैं तो मैं उनके पाँवों में लेपित चंदन को साफ़ करती हूँ, शीतलता के लिए खस की टट्टी, कूलर आदि का उपयोग करती हूँ। रात्रि के समय गुरुदेव को शिवस्वरूप में शक्तिसहित अपने मस्तिष्क के सहस्रदल सुवर्णकमल में स्थापित करती हूँ। पुन: पूर्ववत स्नान अभिषेक करती हूँ। गुरुदेव को श्री एकनाथलिंगजी के रूप में स्थापित कर शिव सहस्रनाम के साथ सहस्र बिल्वपत्र अर्पित करती हूँ। नैवेद्य धराने के पश्चात उन्हें शक्तिसहित रत्नजटित पलंग पर लिटाती हूँ। उनके चरणों को चम्पी करती हूँ, सहलाती हूँ। नामस्मरण करते करते शिवात्म सद्गुरु को कोटि कोटि प्रणाम करके लौट आती हूँ। ऐसे त्रिकाल नित्य पूजा नित्य करती हूँ। इस समय सायास ध्यान लगने नहीं देती, क्योंकि इससे पूजा अपूर्ण रह जाती है। मानस पूजा के उपरान्त ही मैं चाय, फ़ल या अन्न का सेवन करती हूँ। मुझे मानस-पूजा में ही सद्गुरुदेव के संकेत और आदेश मिलते रहते हैं।

पूर्वप्रसिद्धी- शिवप्रवाह अप्रैल २००९.

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One response to “मानस पूजा- ’बा’ का अनुभव

  1. Dr.AJAY BANSAL

    अगस्त 15, 2013 at 9:59 पूर्वाह्न

    GURU SAAKSHAAT PARABRAHMA.
    TASMAI SHRIGURUVAI NAMAH.

     

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