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अष्टदल

09 सितम्बर

गुरु पूर्णिमा पर यह कविता प.पू. ‘बा’ के मुख से उस्फूर्त कही गई|

ध्यान करो भाई ध्यान करो
गहरा गहरा ध्यान करो || धृ. ||

सद्गुरु दीक्षा देते नहीं
आपका नामकरण करते है
तू शिव है भाई तू शिव है
अच्छा खासा ध्यान करो ||१||

नर को कहते है तूं नारायण है
पुरुष को कहते है तू पुरुषोत्तम है
नारी तो नारायणी है
अपने भीतर को खोजना है ||२||

जीव कहते है तू शिव है
सोऽहम् मंत्र जगाते है
तू ही खुद ईश्वर है
सद्गुरु महिमा न्यारी है ||३||

कान के कुंडल जैसी कुंडलिनी रे
बाल से भी पतली रे
कुम् कुम् जैसी होती रे (हिरकणी दिखती रे)
केवल साढ़े तीन इंच लंबी रे ||४||

यही अंबा, यही जगदंबा,
यही महाकाली रे
इसी में त्रिभुवन समाया रे
यही आनंदमयी उल्हासिनी माँ है रे ||५||

शिव का नाम लेते ही
कुण्डलिनी कुंडल छोड़ देती है
शिव मिलन के लिये
कमल भेदन कर देती है ||६||

आप शक्ति के पुजारी बन जाओ रे
शिव ध्यान में लग जाओ रे
शक्ति आपको संम्हालती रे
आप उसके बालक बन जाओ रे ||७||

उसकी गोद में लेट जाओ रे
वह लोरी गाकर अनाहत नाद सुनाती रे
वह नितनित् मिष्टान्न खिलाती रे
चाँद तारोंका खेल दिखाती रे||८||

अपने आँचल में आपको ढँक लेती रे
अमृत का स्तनपान कराती रे
रोमरोम में समा जाती रे
आँच न किसीपे आने देती रे ||९||

पापो को पी लेती रे
बीमारियां खा जाती रे
भूत प्रेत को भागाती रे
पास न किसी को आने देती रे ||१०||

शक्ति दौड़ी दौड़ी आती है
नरनारी को कवच में बाँध देती है
उचित है वही करती है
यही कुंडलिनी जगदंबा है ||११||

अष्टदल का चरखा है
दो कमल तो स्थायी है
छ: का भेदन करना है
नाडी शुद्ध करनी है ||१२||

त्रिकोण में सोती रे
सद्गुरु दीक्षा देते ही
आग का गोला बनती रे
फड़फड़ाती हुई कार्यरत हो जाती रे ||१३||

मूलाधार में देवता से मिलती रे
स्वाधिष्ठान में रमती रे
मणीपूर में ताथैय्या करती रे
अनाहत में गाती रे ||१४||

विशुद्ध में लहराती बलखाती रे
पिया मिलन को जाती रे
विभोर होकर शिव से लिपट जाती रे
परम सुख को पाती रे ||१५||

नाक दबाकर, भृकुटि दबाकर
दशमव्दार ज्ञान चक्र खोलती रे
अमृत की धारा बहती रे
इसका प्रतीक नंदी है रे ||१६||

नदी सागर में मिलकर
सागर बन जाती रे
शक्ति शिव से मिलकर
शिव बन जाती रे ||१७||

सागर में गागर है रे
सहस्रदल में तिलमात्र शिवलिंग रे
जो बाहर है, वही अंदर रे
यही सद्गुरु की महिमा रे ||१८||

नासाग्री दृष्टि रखो रे
बुद्धि को अर्पण करो रे
कुबुद्धि को गंवाओ रे
ध्यान करो भाई ध्यान करो….||१९||

पूर्वप्रसिद्धी शिवसुगंध

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