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साधन पथ सांप-सीढ़ी खेल जैसा है।

11 नवम्बर

मेरे सभी प्यारे साधकों को दीपावली के पावन पर्व पर अनेक-अनेक शुभाशीर्वाद, नूतन वर्ष हेतु शुभकामनाएं। आने वाले वर्ष में आप सभी साधक तीव्रता से साधनरत हों और आप सभी के परिवार में सुख, समृद्धि, सौहार्द एवं स्वास्थ्य की वर्षा निरंतर हो ऐसी श्रीसद्गुरुदेव से मंगल प्रार्थना।
इस दीपावली पर मैं चाहती हूँ की हम सभी एक छोटा सा संकल्प लें। स्वयं को बदलने का संकल्प। यह बदलाव भले ही छोटा हो और यह परिवर्तन भले ही धीरे-धीरे हो किन्तु हो निश्चित। हम औरों के बदलने का हमेशा प्रयास करते हैं। हम समाज सुधारने की बात करते हैं। विश्व कल्याण की सोच रखते हैं। किन्तु यह सब हकीकत में क्या है हम सभी जानते है। जो स्वयं को बदल नहीं सके वो औरों की, समाज की, विश्व की क्या बात करे, और क्यों करें? और अगर करना भी है तो आरंभ तो स्वयं से ही करना होगा।
तो यह छोटा सा ध्येय लेकर शुरुआत करें। जो भी हम में दुर्गुण हो, चाहे झूठ बोलने की आदत, औरों से ईर्ष्या, बुरे व्यसन, किसी की बिना वजह और बगैर किसी ठोस कारण के निंदा, आलस्य, किसी से ईर्ष्यावश प्रतिस्पर्धा, झूठ, द्वेष, क्रोध, लोभ, लालच, बुरी नियत, अन्य धर्मों, आश्रमों की या देवालयों की निंदा, धर्म एवं ईश्वर के नाम पर अंधविश्वास, ढोंग आदि-आदि जो भी बुराइयां हम में हैं उन्हें मिटाने का संकल्प लें |
इसका बड़ा सरल तरीका है पहले तो आसन पर नियमित रूप से साधन करें| उसी आसन पर बैठ कर विचार करें कि क्या जो हम कर रहे हैं वो हमारे सद्गुरु को भाएगा? क्या हम सर उठा कर अपनी इस आदत का, कृत्य का बखान सद्गुरु के समक्ष कर पाएंगे ? क्या इसीलिये हमने यह अद्भुत और अनमोल शक्तिपात दीक्षा ली है? याद रहे शक्ति याने आग का गोला है, उससे खेलना मत, एक पल में वो सब कुछ ख़ाक कर सकती है| यह शक्ति बड़ी अद्भुत है| निर्माण की ओर, सकारात्मकता की ओर बढ़ेगी तो निहाल कर देगी, नकारात्मकता या विध्वंश की ओर चलेगी तो बेहाल कर देगी| अत: इसके जागरण का एक उपाय है, सदगुरुदेव से ही इन अवगुणों को हटाने हेतु सहायता की प्रार्थना करें और उसी क्षण से स्वयं इन आदतों को बदलने का सच्चा प्रयास करें| अपना निरर्थक अहंकार निकाल फेंकें, स्वयं को सबसे होशियार, बुद्धिमान, श्रद्धावान् और बड़ा अधिकारी मानने के बजाय सबसे छोटा मानें | जो भी अच्छा हो रहा है वो ईश्वर की, मेरे सद्गुरु की असीम अनुकंपा है, यही भाव हमेशा मन में रखें | यह सब कोई एक या दो दिन का प्रयास नहीं है, यह ज्ञान अंतर्मन से, यह बोध अंतरात्मा से उठना चाहिए।
ध्यान रहे साधक का जीवन सांप-सीढ़ी के पारम्पारिक खेल जैसा है। ऊपर बढ़ने की जो सीढ़ियां हैं वो गुरुकृपा है किंतु ध्यान रहे हर सीढ़ी के बाद एक सांप भी है जो सीधे नीचे की ओर धकेलता है। जैसे-जैसे खेल आगे बढता है सांप बड़ा होता जाता है और सबसे बड़ा सांप मंजिल के ठीक एक कदम पहले है। यहां उसके दंश में आ गए तो ठेठ नीचे, पतन की गर्त में जाना निश्चित है। ये सांप क्या हैं? ये हैं हमारे अहंकार, अभिमान और कभी कभी तथाकथित स्वाभिमान। जब ये सांप दस लेते हैं तो हमारी दृष्टि धुंधलाने लगती है, जब इन सांपों का विष चरम पर होता है तो हम दृष्टिहीन, विचारहीन व विवेकहीन हो जाते हैं। उस समय हम सद्गुरु की आवाज सुन नहीं सुन सकते, उन्के संकेत हम समझ नहीं सकते। कोढ़ में खाज का आलम यह होता है कि हम अपने आपको उनसे भी श्रेष्ठ समझने लगते हैं। किसी भी साधक के जीवन में सांपों से बचना उतना ही आवश्यक है जितना कि सीढ़ी पर चढ़ना। बल्कि सांपों से बचना अधिक जरुरी है। एक बार सीढ़ी चूक भी गए तो कम से कम वहां तो खड़े ही रहेंगे, नीचे तो नहीं जायेंगे, एक एक कदम आगे बढ़ने के अवसर तो पास में होंगे ही। किन्तु सांप ने डस लिया तो नीचे गिरना अवश्यंभावी है। सीढ़ी चढ़ेंगे या सांप ड़सेगा इसका निर्णय कौन करता है? जाहिर हैं खेल में प्रयुक्त होने वाला पासा। यह पासा कैसे डालना यही तो साधन है। पासे को साधन से ही साधा जा सकता है। कितने अंक चाहिए इसकी दक्षता साधन से ही आयेगी। अत: ज्यों ज्यों साधन सधेगा सांप से बचने और सीढ़ी को पकड़ने की पात्रता भी विकसित होने लगेगी।
अगर साधक नियमित साधनरत है  तो भीतर आत्मज्ञान का दीपक जलेगा ही| उसी अंतस के दीपक से साधन-पथ प्रकाशित होगा| फिर तो सांप भी सांफ नजर आने लगेगा और सीढ़ी भी। कहां सांप है और कहां सीढ़ी पर चढ़ने के लिए पासा कैसे पड़ेगा यह भी महारत हासिल होने लगेंगी।
दीपावली पर मेरे सभी साधकों के लिए मैं यही कामना करती हूँ कि आप अपने जीवन में हमेशा गुरुकृपा की सीढियां चढ़ते रहें और सांपों से बचते हुए अपनी मंजिल तक हँसते, खेलते, परमानंद में झूमते हुए पहुंच जायें। वहां सद्गुरु अपने दोनों हाथ पसारे आपको आलिंगित करने, आपको अपने आप में समाने हेतु प्रतीक्षारत हैं। जय श्रीकृष्ण।
–आपकी अपनी बा
पूर्वप्रसिद्धी शिवप्रवाह ऑक्टोबर २०११.

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Posted by on नवम्बर 11, 2012 in नवीन

 

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