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मन मंदिर में उज्ज्वल हो, तेरा निर्मल ज्ञान…व. राव.

12 नवम्बर

सद्गुरु दीपक है, प्रकाश है, मशाल है। है, मगर किसलिए? हमारे जेहन में तो यही बात बैठी हुई है कि अंधेरा हो तो दीपक, प्रकाश या मशाल काम में लें। बाहर प्रकृति की ऐसी व्यवस्था है कि 12 घण्टे अंधेरा और 12 घण्टे प्रकाश रहता है। हम बाहरी अंधेरे के आधे काल को प्रकाशित करने में अपना पूरा जीवन गुजार देते हैं। सद्गुरु दीपक यदि बाहरी प्रकाश को दूर करने का साधन ही होते तो प्रकृति ने सूरज और चांद क्यों बनाये? बाहरी प्रकाश तो सभी को उपलब्ध है, सद्गुरु प्रकाश तो घट के अंधकार को विदीर्ण करने के लिए है। हमारी लालसाओं की पूर्ति बाहरी अंधकार को प्रकाशित करना ही तो है। इसी में हम उस दिव्य प्रकाश को खपा देते हैं। यह ध्यान रहे बाहरी अंधकार रोज हटेगा रोज उपजेगा। किन्तु भीतर का अंधकार तो एक ही बार हटाना है, फ़िर तो हमारा अपना अंतर्दीप जल उठेगा। हम प्रकाश का उपयोग तो करते हैं पर उपयोग सही स्थान पर करना भी प्रारंभ करें।…व. राव.

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Posted by on नवम्बर 12, 2012 in नवीन

 

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