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सद्गुरु वारिधि की करुणकृपा

05 अप्रैल

baa with lace frame

परमहंस राजयोगी प्रभु बा का निरंतर प्रवास साधकों के कल्याण के लिए एक विशेष आयोजन है। ये प्रवास प्रभु बा द्वारा विकसित साधन-पद्धति के अनिवार्य अंग भी हैं। अपनी इस परम्परा में वाचिक संसाधन को गौण और सद्गुरु संकेत के अनुसार कर्तृत्त्व को मुख्य माना गया है। यह तभी संभव है जबकि स्वयं सद्गुरुदेव अपने साधकों के प्रत्यक्ष सम्पर्क में आयें व उनकी साधना का सूक्ष्म निरीक्षण कर सकें। इस प्रक्रिया से एक सेतु निर्मित होता है, अनुभवों का नया संसार खुलता है, सद्गुरु – साधक सुसंवाद का अवसर सृजित होता है, अनेक शंकाओं का त्वरित समाधान भी होता है। इन सबसे ऊपर अपने सद्गुरु की अपेक्षाओं के अनुरूप बनने की ललक प्रगति पाती है। यही ललक जब सद्गुरु तत्त्व से एकाकार होकर ऊर्ध्व गमन करती है तो शिवत्व की ओर प्रयाण अवश्यंभावी होता है। संभवत: इसी मंत्र को साक्षात् सिद्ध करने हेतु प.पू. प्रभु बा स्थान-स्थान पर जाकर अपने साधकों, भाविकों और अध्यात्मप्रेमियों में एक विशिष्ट क्षमता विकसित करनें में रत हैं। बादल हर जगह जाकर जैसे प्यासी धरती को तृप्त करते हैं वैसे ही सद्गुरुदेव का भ्रमण है। सद्गुरु वारिधि की इतनी करुणकृपा है कि हमें अपनी गागर को सीधा रखना भर है। हमें धारण करना है पूरी निश्चिंतता, पूरा विश्वास, पूरी श्रद्धा। यही हमारे लिए निर्धारित भी है  और यही हमारे वश में भी है। जो हमारे लिए नियत और संभव है उसे छोड़कर हम कहां जाएं? क्यों जाएं? इसी समझ को ही तो अनन्य श्रद्धा कहते हैं।…वरदीचन्द राव.

अपनी बात फ़रवरी २०१२

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