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सद्गुरु शिव

05 जून

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शिव जब आँखें खोलते हैं,

तो वे साधकों के मन को टटोलते हैं,

वे नाप लेते हैं

उनके साधन की गहराई

कर लेते हैं आकलन कि

किसके अंतस में

ध्यान की कितनी फ़सल है लहराई।

 

शिव जब आँखें बंद करते हैं

तो एक एक साधक को अपने दिल में

क्षमतानुसार उचित आसन पर

बिठाते जाते हैं।

फ़िर सभी को

अपने स्नेहरूपी धागे से जोड़कर

वासुदेव कुटुम्ब की

प्यारी सी माला बनाते हैं।

 

शिव जब मुस्कुराते हैं

तो वे कहते हैं–शाबाश, बढ़ते रहो, कहीं रुक नहीं जाना हैं।

 

शिव जब हाथ उठाते हैं

तो हमें संकेत करते हैं

कि तुम्हें बस यहीं तक तो आना हैं।

 

शिव जब आशीर्वाद मुद्रा में होते हैं

तो सम्पूर्ण ब्रहमाण्ड की शक्ति हममें उण्डेल जाते हैं।

किस्मत हमारी है कि हम कितना ग्रहण कर पाते हैं।

 

शिव की ये सारी ही मुद्राएं, हमारे कल्याण के आयोजन हैं।

इनके सुझाए जप, ध्यान और सत्संग, हमारी आत्मा के भोजन हैं।

जो साधक की आत्मा के उन्नयन हेतु लीलाएं रचाता है।

वही सद्गुरु है, वही तो शिव कहाता है।

ऐसे सद्गुरु शिव की स्तुति ही

सहज संवेदना व स्फ़ुरणा प्रकटाती है।

सांसों में स्पंदन और संकल्पों में सबलता लाती हैं।

 

मेरे सद्गुरु मेरे शिव, तुम हम पर इतना अनुग्रह बरसाना।

हर शिवरात्रि को अपनी समस्त मुद्राओं का दर्शन कराना।

उन मुद्राओं के प्रभाव से हम यों शिवमय हो जाएं।

जिस सद्गुरु शिव ने प्रकटाया है,

अंतत: हम उसकी सत्ता में ही समा जाएं।

महाशिवरात्री पर रावसाहेबद्वारा विरचित आस्थाकाव्य

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1 टिप्पणी

Posted by on जून 5, 2013 in नवीन

 

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One response to “सद्गुरु शिव

  1. Hitoo

    जून 16, 2013 at 7:11 अपराह्न

    Jai Shri Krishna, jai Ho……… khubsoorat… Chale chalo …. Guru Ki Fauj. Kare Mauj…

     

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