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Category Archives: पुनःप्रकाशित लेख

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सद्गुरु का सहज स्वभाव

Feb 2013

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शिव ने सद्गुरु रूप है धारा — व. राव

feb14-2

सद्गुरु क्या संबंध हमारा?
जो बिनु साधन हमको तारा।
कूड़े- कर्कट से चुन-चुन के,
झाड़ -पोंछकर हमें उठाया।
हमको ठौर कहाँ मिल पाती,
पर तुमने दिल में बैठाया ।
कहाँ पड़े थे पग-पग लाले,
बिन माँगे दे दिया सवाया।
एक कदम भी चल नहीं पाए,
फ़िर भी तुमने खूब निभाया।
जाने कैसा पुण्योदय जो, मिला हमें है सबलसहारा॥….
सुनते-पढ़ते रहे खूब हम,
बड़ी विलक्षण सद्गुरु माया।
लेकिन जबसे तुमको देखा,
अर्थ समझ में तब ही आया।
तेरे बल पर हमने सद्गुरु,
चींटी होकर गिरि उठाया।
श्रम करते तो दीखे हम सब,
लेकिन तुम्हें पसीना आया।
तुमने खूब तराशा हमको, हर पहलु से हमें संवारा॥…..
लुका-छिपी का खेल कहाँ तक,
खेलोगे हमसे गुरुराया।
क्यों नहीं कहते फ़िर प्रकटा हूँ,
साधक के सिर करने छाया।
एक-एक साधक चुन-चुन के,
बुला-बुला कर गलें लगाया।
क्यों स्वीकार नहीं कर लेते,
जान गई अब सारी दुनिया, शिव ने सद्गुरु रूप है धारा॥
सद्गुरु यह संबंध हमारा॥

–वरदीचन्द राव.

चैतन्य दिवस पर रावसाहाब की अभिव्यक्ती

 

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आनन्द की यात्रा

Anand kee yatra

 

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साधना का सार

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सद्गुरु शिव की सन्निधि है।
वह पालनकर्त्ता विष्णु है,
वही सर्जक विधि है।
वह देव है, देवालय है, देवात्मा है।

सद्गुरु साक्षात परमात्मा है।
सद्गुरु जीवन की काकड़ आरती है।
वह साधक के जीवन-रथ का
स्वयंभू सारथी है।

सद्गुरु सारे नक्षत्रों का चरण है।
वह विराट स्वरूप का
धरती पर टिका पहला चरण है।
सद्गुरु प्रकृति का उत्साह है।
वह कलकल करती नदियों का
निर्मल-प्रवाह है।
वह आकाश सा उठाव
और सागर सी गहराई है।

सद्गुरु अध्यात्म की
मंद मंद चलती पुरवाई है।
सद्गुरु विराट स्वरुप द्वारा
गाया हुआ संकल्पभरा गीत है।
इसीलिए सद्गुरु की महिमा
शब्दातीत है।

सद्गुरु कहां और कब नहीं है?
यही बात तो
हरेक शास्त्र ने कही है।
सद्गुरु नेति नेति है,
शाश्वत है, अनादि है।
इसका वरदान
दुर्लभ और सधी हुई समाधि है।

सद्गुरु को बुद्धि से नहीं
संकल्पों से पाया जाता है।
साधक के हर संकल्प के साथ
यह रिश्ता और गहराता है।
संकल्पों से उगती है वे आंखे,
जो उस पार तक देख पाती है।

सद्गुरु अनुग्रह के अंजन से
उनमें दिव्य ज्योति समाती है।
तब साधक और सद्गुरु
हो जाते एकाकार हैं।
यही पूर्णाहुति है,
यही परम सत्य है,
यही परम्परा है और यही
सम्पूर्ण साधना का सार है।

वरदीचन्द राव द्वारा संकल्प दिवस पर द्वारका में प्रस्तुत रचना

 

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जन्मोत्सव २०११- वरदीचन्द राव.

Janmotsav-2011

–व. राव द्वारा बदलापुर में 25 मई को संकल्प दिवस पर प्रस्तुत काव्य

पूर्वप्रसिद्धी मई-जून 2011.

 

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सद्गुरु वारिधि की करुणकृपा

baa with lace frame

परमहंस राजयोगी प्रभु बा का निरंतर प्रवास साधकों के कल्याण के लिए एक विशेष आयोजन है। ये प्रवास प्रभु बा द्वारा विकसित साधन-पद्धति के अनिवार्य अंग भी हैं। अपनी इस परम्परा में वाचिक संसाधन को गौण और सद्गुरु संकेत के अनुसार कर्तृत्त्व को मुख्य माना गया है। यह तभी संभव है जबकि स्वयं सद्गुरुदेव अपने साधकों के प्रत्यक्ष सम्पर्क में आयें व उनकी साधना का सूक्ष्म निरीक्षण कर सकें। इस प्रक्रिया से एक सेतु निर्मित होता है, अनुभवों का नया संसार खुलता है, सद्गुरु – साधक सुसंवाद का अवसर सृजित होता है, अनेक शंकाओं का त्वरित समाधान भी होता है। इन सबसे ऊपर अपने सद्गुरु की अपेक्षाओं के अनुरूप बनने की ललक प्रगति पाती है। यही ललक जब सद्गुरु तत्त्व से एकाकार होकर ऊर्ध्व गमन करती है तो शिवत्व की ओर प्रयाण अवश्यंभावी होता है। संभवत: इसी मंत्र को साक्षात् सिद्ध करने हेतु प.पू. प्रभु बा स्थान-स्थान पर जाकर अपने साधकों, भाविकों और अध्यात्मप्रेमियों में एक विशिष्ट क्षमता विकसित करनें में रत हैं। बादल हर जगह जाकर जैसे प्यासी धरती को तृप्त करते हैं वैसे ही सद्गुरुदेव का भ्रमण है। सद्गुरु वारिधि की इतनी करुणकृपा है कि हमें अपनी गागर को सीधा रखना भर है। हमें धारण करना है पूरी निश्चिंतता, पूरा विश्वास, पूरी श्रद्धा। यही हमारे लिए निर्धारित भी है  और यही हमारे वश में भी है। जो हमारे लिए नियत और संभव है उसे छोड़कर हम कहां जाएं? क्यों जाएं? इसी समझ को ही तो अनन्य श्रद्धा कहते हैं।…वरदीचन्द राव.

अपनी बात फ़रवरी २०१२

 

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साहसिक संकल्प

Calendar 2013-3

न शास्त्रों को खंगाला, न रूढ़ियों को पाला,
और न ही अपनाए सदियों से प्रचलित थोथे कर्मकाण्ड।
फ़िर भी साढ़े तीन दशक में ही तुमने नाप लिया
अध्यात्म का सकल ब्रह्माण्ड ।
यह तुम्हारा लाघव है या उत्कर्षभरा मुमुक्षुभाव है
या कि सद्गुरुकृपा से शक्ति का शिव से जुड़ाव है।
तुम्हारे चेहरे से पल-पल झरते राजयोग के मधु को
संचित करने में जुटा वासुदेव कुटुम्ब
परम्परा का एक पावन पड़ाव है।
ये पड़ाव यों ही लगते रहें
चेतना का शंखनाद होता रहे।
तुम्हारे आत्मिक स्नेह-नद में हमारा भौतिक स्वरूप
अपने साधक-मन को भिगोता रहे।
यह संसर्ग ही ध्वस्त कर देगा
संशय की निर्मूल भित्ति।
अनावृत्त हो उठेगी भावों की प्रतिमा, फ़ैलेगी साधना की सौरभ;
जागेगी हमारी भी चित्ति।
विश्वास है कि हम भी शक्तिपात साधना में रत दिखेंगे।
इस दीक्षा दिवस से प्रेरित होकर हम भी
धीरे-धीरे ’बा’ बनना सीखेंगे।
—–वरदीचन्द राव.

बा के दीक्षा दिवस पर विशेष

डिसें 2008 शिवप्रवाह.

 

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